Wednesday, April 23, 2014

पेट के रोगों को डिटॅाक्स

पेट के रोगों में आंतों को डिटॅाक्स करने के तरीके --
पेट के रोगों में आंतों को डिटॅाक्स करने के तरीके -- 

आंतों में विजातीय तत्व और भोजन के अपशिष्ट पदार्थ जमा होते रहते हैं।त्रिफला चूर्ण इन्हें स्वाभाविक ढंग से शरीर से बाहर निकालने में सहायता करता है। यह आंतों को स्वच्छ कर डिटॅाक्स करता है। विषैले तत्व बाहर निकलने पर शरीर का फालतू वजन भी कम होने लगता है। त्रिफला अम्ल पित्त यानी ऍसीडीटी को भी नियंत्रित करता है। त्रिफला लिवर को भी डिटॅाक्स करता है। रात को सोते समय गुन गुने पानी से एक चम्मच चूर्ण लेना उचित है।
गेहूं का चोकर जिसे अक्सर लोग फ़ेंक देते हैं यह छिलका फाइबर और विटामिनयुक्त होता है। यह चोकर शरीर में जमा वसा को सोख लेता है जिससे अनावश्यक चर्बी समाप्त होकर शरीर का वजन नियंत्रण में रहता है। गेहूं का चोकर गर्म दूध में मिलाकर लेने से शरीर का वजन कम होता है।

अपच रोग में पपीता और पाइनएप्पल फल बहुत उपकारी हैं। पपीते में ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा बहुत कम होने से यह डायबिटीज ,आर्थराइटिस और मोटापा में हितकारी सिद्ध होता है। इसका पेपैन अेंजाइम भोजन पचाने में सहायक है।रात के भोजन से कुछ पहिले पपीते और पाइनएप्पल के कुछ टुकडे लेने से पाचन संस्थान ठीक रहता है।

सुबह उठते ही आधा लिटर गुन गुना पानी नियमित पीना शरीर के स्वास्थ्य के लिये हितकर रहता है।भूख शांत करने के लिये स्नेक्स या फ्राइड फूड खाने से वजन बढता है और एसिडिटी जैसी समस्यायें पैदा हो जाती हैं।

भोजन के साथ फलों का सलाद लेना फायदेमंद होता है। आंतों में विजातीय तत्व और भोजन के अपशिष्ट पदार्थ जमा होते रहते हैं।त्रिफला चूर्ण इन्हें स्वाभाविक ढंग से शरीर से बाहर निकालने में सहायता करता है। यह आंतों को स्वच्छ कर डिटॅाक्स करता है। विषैले तत्व बाहर निकलने पर शरीर का फालतू वजन भी कम होने लगता है। त्रिफला अम्ल पित्त यानी ऍसीडीटी को भी नियंत्रित करता है। त्रिफला लिवर को भी डिटॅाक्स करता है। रात को सोते समय गुन गुने पानी से एक चम्मच चूर्ण लेना उचित है।
गेहूं का चोकर जिसे अ...क्सर लोग फ़ेंक देते हैं यह छिलका फाइबर और विटामिनयुक्त होता है। यह चोकर शरीर में जमा वसा को सोख लेता है जिससे अनावश्यक चर्बी समाप्त होकर शरीर का वजन नियंत्रण में रहता है। गेहूं का चोकर गर्म दूध में मिलाकर लेने से शरीर का वजन कम होता है।
अपच रोग में पपीता और पाइनएप्पल फल बहुत उपकारी हैं। पपीते में ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा बहुत कम होने से यह डायबिटीज ,आर्थराइटिस और मोटापा में हितकारी सिद्ध होता है। इसका पेपैन अेंजाइम भोजन पचाने में सहायक है।रात के भोजन से कुछ पहिले पपीते और पाइनएप्पल के कुछ टुकडे लेने से पाचन संस्थान ठीक रहता है।
सुबह उठते ही आधा लिटर गुन गुना पानी नियमित पीना शरीर के स्वास्थ्य के लिये हितकर रहता है।भूख शांत करने के लिये स्नेक्स या फ्राइड फूड खाने से वजन बढता है और एसिडिटी जैसी समस्यायें पैदा हो जाती हैं।
भोजन के साथ फलों का सलाद लेना फायदेमंद होता है।
 

Friday, April 18, 2014

संधिवात (ARTHRITIS)

संधिवात 
संधिवात में शरीर के किसी संधि जोड में शोध की उत्पत्ति होती है। धीरे-धीरे शोथ विकसित होता है और तीव्र शूल होने लगता है। शोथ के कारण त्वचा लाल हो जाती है। संधि शोथ को स्पर्श करने में भी पीड़ा होती है। रात को अधिक पीड़ा होने से रोगी की नींद नष्ट हो जाती हैं।

संधि शोथ और शूल के कारण रोगी चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है। उठकर खड़े होने में भी तीव्र शूल होता है। संधिवात के कारण रोगी को ज्वर भी हो जाता है। संधिवात के उग्र रूप धारण करने पर रोगी की भूख नष्ट हो जाती है।

क्या खाएं?

* लहसुन की एक-दो कली प्रतिदिन हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।
* गर्म जल व दूध में मधु मिलाकर पीने से बहुत लाभ होता है।
* लहसुन की कलियों को सरसों के तेल में देर तक उबालकर जलाएं, फिर उस तेल को छानकर संधि शोथ के अंगों पर मालिश करें।
* मेथी का चूर्ण बनाकर प्रतिदिन 3 ग्राम चूर्ण हल्के गर्म जल के साथ सेवन करने से संधिवात का शूल कम होता है।
* संधिवात का रोगी कोष्ठबद्धता होने पर एरंड का तेल 7-8 ग्राम की मात्रा में उबाले हुए दूध में डालकर पिएं।
* अदरक के 5 ग्राम रस में मधु मिलाकर सेवन करने से संधि शूल नष्ट होता है।
* महा नारायण तेल की संधि शोथ पर मालिश करें।
* चुकंदर का सेवन करने से संधि शूल नष्ट होता है।
* प्याज के रस को सरसों के तेल में मिलाकर हल्का-सा गर्म करके संधि शोथ पर मलने से बहुत लाभ होता है।
* आलू की सब्जी खाने से शूल कम होता है।
* कुलथी को जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। क्वाथ को छानकर उसमें सोंठ का चूर्ण और सेंधा नमक मिलाकर पिएं।
* अजवायन का 3 ग्राम चूर्ण थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।

क्या न खाएं?

* संधिवात के रोगी शीतल खाद्य और शीतल पेयों का सेवन न करें।
* सब्जियों में गाजर, मूली, टमाटर, अरबी, कचालू, फूलगोभी, भिंडी न खाएं।
* दही और तक्र (मट्ठे) का सेवन न करें।
* चावल व उड़द की दाल का सेवन न करें।
* घी, तेल, मक्खन से बने पकवान न खाएं।
* मांस, मछली व अंडे के साथ-साथ उष्ण मिर्च-मसालों से बनी तली हुई चीजों का सेवन ना करें।
* नंगे पाव फर्श पर न घूमें।
* भीगे वस्त्रों में देर तक न रहें।

प्रतिदिन पूज्य स्वामी जी महाराज द्वारा सिखाये जाने वाले सातों प्राणायामों का अभ्यास मंद गति से करें  ,लाभ होगा |संधिवात
संधिवात में शरीर के किसी संधि जोड में शोध की उत्पत्ति होती है। धीरे-धीरे शोथ विकसित होता है और तीव्र शूल होने लगता है। शोथ के कारण त्वचा लाल हो जाती है। संधि शोथ को स्पर्श करने में भी पीड़ा होती है। रात को अधिक पीड़ा होने से रोगी की नींद नष्ट हो जाती हैं।
संधि शोथ और शूल के कारण रोगी चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है। उठकर खड़े होने में भी तीव्र शूल होता है। संधिवात के कारण रोगी को ज्वर भी हो जाता है। संधिवात के उग्र रूप धारण करने पर रोगी की भूख नष्ट हो जाती है।
क्या खाएं?
* लहसुन की एक-दो कली प्रतिदिन हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।
* गर्म जल व दूध में मधु मिलाकर पीने से बहुत लाभ होता है।
* लहसुन की कलियों को सरसों के तेल में देर तक उबालकर जलाएं, फिर उस तेल को छानकर संधि शोथ के अंगों पर मालिश करें।
* मेथी का चूर्ण बनाकर प्रतिदिन 3 ग्राम चूर्ण हल्के गर्म जल के साथ सेवन करने से संधिवात का शूल कम होता है।
* संधिवात का रोगी कोष्ठबद्धता होने पर एरंड का तेल 7-8 ग्राम की मात्रा में उबाले हुए दूध में डालकर पिएं।
* अदरक के 5 ग्राम रस में मधु मिलाकर सेवन करने से संधि शूल नष्ट होता है।
* महा नारायण तेल की संधि शोथ पर मालिश करें।
* चुकंदर का सेवन करने से संधि शूल नष्ट होता है।
* प्याज के रस को सरसों के तेल में मिलाकर हल्का-सा गर्म करके संधि शोथ पर मलने से बहुत लाभ होता है।
* आलू की सब्जी खाने से शूल कम होता है।
* कुलथी को जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। क्वाथ को छानकर उसमें सोंठ का चूर्ण और सेंधा नमक मिलाकर पिएं।
* अजवायन का 3 ग्राम चूर्ण थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।
क्या न खाएं?
* संधिवात के रोगी शीतल खाद्य और शीतल पेयों का सेवन न करें।
* सब्जियों में गाजर, मूली, टमाटर, अरबी, कचालू, फूलगोभी, भिंडी न खाएं।
* दही और तक्र (मट्ठे) का सेवन न करें।
* चावल व उड़द की दाल का सेवन न करें।
* घी, तेल, मक्खन से बने पकवान न खाएं।
* मांस, मछली व अंडे के साथ-साथ उष्ण मिर्च-मसालों से बनी तली हुई चीजों का सेवन ना करें।
* नंगे पाव फर्श पर न घूमें।
* भीगे वस्त्रों में देर तक न रहें।

Monday, April 14, 2014

HAZARDS OF MICROWAVE COOKING??

Consumers are dying today in part because they continue to eat dead foods that are killed in the microwave. They take a perfectly healthy piece of raw food, loaded with vitamins and natural medicines, then nuke it in the microwave and destroy most of its nutrition.
Humans are the only animals on the planet who destroy the nutritional value of their food before eating it.
All other animals consume food in its natural, unprocessed state, but humans actually go out of their way to render food nutritionally worthless before eating it. No wonder humans are the least healthy mammals on the planet.
The invention of the microwave and its mass adoption by the population coincides with the onset of obesity in developed nations around the world. Not only did the microwave make it convenient to eat more obesity-promoting foods, it also destroyed much of the nutritional content of those foods, leaving consumers in an ongoing state of malnourished overfeeding. In other words, people eat too many calories but not enough real nutrition. The result is, of course, what we see today: Epidemic rates of diabetes, cancer, heart disease, depression, kidney failure, liver disorders and much more.
Microwaves make malnutrition virtually automatic, and being exposed to toxic chemicals is easy to accomplish by simply eating processed foods (which are universally manufactured with the addition of toxic chemicals that act as preservatives, colorings, flavor enhancers and so on).
Here are some of recent scientific findings on microwaving food:
1. Microwaved foods lose 60 ~ 90% of the vital-energy field and microwaving accelerates the structural disintegration of foods.
2. Microwaving creates cancer-causing agents within milk and cereals.
3. Microwaving alters elemental food-substances, causing digestive disorders.
4. Microwaving alters food chemistry which can lead to malfunctions in the lymphatic system and degeneration of the body’s ability to protect itself against cancerous growths.
5. Microwaved foods lead to a higher percentage of cancerous cells in the bloodstream.
6. Microwaving altered the breakdown of elemental substances when raw, cooked, or frozen vegetables were exposed for even a very short time and free radicals were formed.
7. Microwaved foods caused stomach and intestinal cancerous growths, a generaldegeneration of peripheral cellular tissues, and a gradual breakdown of the digestive and excretive systems in a statistically high percentage of people.
8. Microwaved foods lowered the body’s ability of the body to utilize B-complex vitamins, Vitamin C, Vitamin E, essential minerals and lipotropics.
9. The microwave field next to a microwave oven caused a slew of health problems as well.
10. Heating prepared meats in a microwave sufficiently for human consumption created:
* d-Nitrosodiethanolamine (a well-known cancer-causing agent)
* Destabilization of active protein biomolecular compounds
* Creation of a binding effect to radioactivity in the atmosphere.
* Creation of cancer-causing agents within protein-hydrosylate compounds in milk and cereal grains.
11. Microwave emissions also caused alteration in the catabolic (breakdown) behaviour of glucoside – and galactoside – elements within frozen fruits when thawed in this way.
12. Microwaves altered catabolic behavior of plant-alkaloids when raw, cooked or frozen vegetables were exposed for even very short periods.
13. Cancer-causing free radicals were formed within certain trace-mineral molecular formations in plant substances, especially in raw root vegetables.
14. Due to chemical alterations within food substances, malfunctions occurred in the lymphatic system, causing degeneration of the immune systems’ capacity to protect itself against cancerous growth.
15. The unstable catabolism of micro-waved foods altered their elemental food substances, leading to disorders in the digestive system.
16. Those ingesting micro-waved foods showed a statistically higher incidence of stomach and intestinal cancers, plus a general degeneration of peripheral cellular tissues with a gradual breakdown of digestive and excretory system function.
17. Microwave exposure caused significant decreases in the nutritional value of all foods studied, particularly:
* A decrease in the bioavailability of B-complex vitamins, vitamin C, vitamin E, essential minerals and lipotrophics
* Destruction of the nutritional value of nucleoproteins in meats
* Lowering of the metabolic activity of alkaloids, glucosides, galactosides and nitrilosides (all basic plant substances in fruits and vegetables)
* Marked acceleration of structural disintegration in all foods.
The microwave does work as advertised, by the way. It makes your food hot. But the mechanism by which heat is produced causes internal damage to the delicate molecular structures of vitamins and phytonutrients. Minerals are largely unaffected, however, so you’ll still get the same magnesium, calcium and zinc in microwaved foods as you would in non-microwaved foods, but the all-important B vitamins, anthocyanins, flavonoids and other nutritional elements are easily destroyed by microwave ovens.
The microwave is the appliance of the living dead. People who use the microwave on a regular basis are walking down a path towards degenerative disease and a lifelong battle with obesity. The more you use the microwave, the worse your nutritional state gets, and the more likely you are to be diagnosed with various diseases and put on pharmaceuticals which, of course, will create other health problems that lead to a grand spiraling nosedive of health.
There is a lot of researching being conducted into microwave oven and the effects that it may have on human bodies. Final studies have not been released as yet, but if the above is any indication to the negative affects on food, I can only imagine the effects on the human body.

Phyllanthus Urinaria Treatment for Fatty Liver

Phyllanthus Urinaria
Phyllanthus Urinaria Treatment for Fatty Liver-
The Chamberbitter (Phyllanthus urinaria / gripewood / chanca Piedra ( 7) / leafflower) native herb plant of Asia, and shrub nuisance for landscapes in Southern States: Florida, Georgia, Alabama, South Carolina, New Mexico or Texas. Description of the herb plant: “Flowers are greenish white, minute and appear at axiles of the leaves, as well as the see capsules. Numerous small green-red fruits, round and smooth, are found along the underside of the stems, which are erect and red.” In the early summer months the broadleaf shrub weed surfaces from warm soils. The Chamberbitter can reach a height of two feet. 1 Many land-owners displeasure this herb weed growth (2). For more than 2,000 years the Phyllanthus urinaria has been prescribed in Andean (Encompassing South America countries 3) medicine and traditional uses. 4 Scientists continue to explore the medicinal life saving treatment of the herb Chamberbitter.
One of the worst weeds for landscapes and nurseries is the Chamberbitter. “Just one plant can release thousands of seeds.” The gripewood is hardy plant that can survive and flourish in the most harsh drought environment. A solution for farmers to eradicate this germinating weed use atrazine (Farmers have relied upon this herbicide for fifty years to fight weeds 5) a couple of times during the growing season. 6 Otherwise, repeated application of herbicide that contains 2, 4 – D (“Weed-B-Gon, Weed Stop, Wipe-Out, etc), controls the weed infestation. 2 Advisable to maintain two – four inch layer of mulch in flower beds, limits the invasion of the Chamberbitter weed. 6 Otherwise, pulling the weed out of the ground may provide sufficient results. 2 The Phyllanthus urinaria does not survive in frost winter months. 6
Civilizations in South America picked Chamberbitter leaves and flowers for medicinal treatment. In Peru, the weed has been an effective treatment to eliminate gall and kidney stones (Chana piedra in South America and the Amazon referred to as “Stone Breaker” 7), bladder inflammation, urinary tract infection, liver problems and chronic hepatitis B or jaundice. “Pharmacology: the primary action of stone breaker is on the liver, it acts by the inhibition of DNA polymerase on the hepatitis B virus.” 4 Besides, herb prevents kidney stones from developing. 7 The book ‘Cat’s Claw: Healing Vine in Peru”, author Kenneth Jones documented the Chanca Piedra extract to be three times more stronger than morphine for inflammatory pain, especially after surgery. 7 “Usual Dosage: 3 times a day for two months.” No side effect has been reported. Available by non-prescription Chanca Piedra tabs each 350 milligrams. Not advisable for children and pregnant women take Chanca Piedra before consulting their physician. 4
“In more affluent countries such as the United States, fatty liver is believed to affect 40 percent of people (15 – 30 percent of the population in Asia) and is the fifth-leading cause of liver failure and liver cancer.” 8 A study by Hong Kong scientist confirmed the plant phyllanthus urinaria reduced substantially fat levels of mice afflicted with nonalcoholic steatahepatitis (NASH) or fatty liver 8: Accumulation of fat in the liver not linked to drinking alcohol and may lead to cirrhosis of the liver. Risk factors likely attributed to NASH: Diabetes, obesity (pot belly), and high cholesterol. Symptoms of nonalcoholic steataheaptitis include Weight loss, fatigue, discomfort in the upper right part of the belly and general weakness. 9 Currently team of scientist in Hong Kong (University Center for Liver Health), evaluating the treatment of chamberbitter among 60 patients with NASH. 8

नेत्र ज्योति बढ़ाने केलिये आसान प्रयोग (Eye Care Tip)

20131225-184211.jpgअसगन्ध 100 ग्राम, बड़ी पीपर 100 ग्राम, आँवला 100 ग्राम, बहेड़ा 100 ग्राम, हरड़ 100 ग्राम, इलायची छोटी 25 ग्राम। प्रत्येक का चूर्ण बनाकर अच्छी तरह मिलाकर रख लें। इसमें से एक चम्मच की मात्रा दूध के साथ नित्य खाली पेट सुबह-शाम लें। साथ ही त्रिफला जल से नित्य प्रातः आँखें धोएँ। इससे आँख का बढ़ता हुआ नंबर रुक जाता है। लंबे समय तक प्रयोग करने से चश्मे का नंबर अवश्य कम हो जाता है।

Pitta?

As per Ayurveda, the body is made up of tissues (dhatus), waste products (malas), and doshas (loosely translated to Energetic Forces). It is the Tridoshas’ job to assist with the creation of all of the various tissues of the body and to remove any unnecessary waste products from the body. It is also the Tridoshas that influence all movements, all transformations, all sensory functions, and many of the other activities in the human body and mind. Out of this tridoshas the Vata dosha is the most important of the three doshas. The Pitta dosha is associated with fire or heat. Kapha is the heaviest of the three doshas. It provides the structures and the lubrication that the body needs.
Now lets understand what is Pitta Dosha, What are Pitta Body Types, and what is important for them to consider with respect to food and what all they need to avoid.
The Pitta Type Body
In Ayurveda Pitta is known as Energy of Digestion and Metabolism. Pitta dosha (bio-energy) is a combination of water and fire elements and formulated by the dynamic interplay of the both. These elements are transformative in nature thus they constantly modulate and control each other. In human body Pitta represents the fire element; it includes gastric fire or digestive fire, action of enzymes and amino acids that play a major role in metabolism, and the neurotransmitters and neuropeptides involved in thinking. People with pitta personality are known for warm friendly behavior and leadership qualities.
Pitta is hot, sharp, light, oily, liquid, and spreading in nature. It is sour, bitter, pungent to the taste, and has a fleshy smell. All these characteristics are revealed in the body of the pitta person. The main centers of pitta in human body are small intestine, stomach, sweat glands, blood, fat, eyes, and skin. Pitta governs digestion, absorption, assimilation, nutrition, metabolism, body temperature, skin coloration, the luster of the eyes, intelligence, and understanding. It gives the person appetite, vitality, and the capacity to learn, understand and determine what is right or wrong. The imbalanced pitta can cause many physical and psychological problems like anger, criticism, negative emotions, acidity, ulcers, heartburn, rashes and thinning hair. Pitta can be thrown out of balance by, eating spicy or sour food; being angry, tired, or fearful; or spending too much time in the sun. People with a predominantly pitta constitution are thought to be susceptible to heart disease and arthritis.

Pitta provides the following functions:

• Metabolism – at all the various levels from digestion of food to transformation of all other material
• Thermogenesis – maintains the proper body temperature
• Vision – converts external images into optic nerve impulses
• Appetite – the feeling of hunger and thirst
• Comprehension – of information into knowledge, also reasoning and judgment
• Courage & Braveness – to face the situation
• Complexion – gives color and softness to skin
Indications of Balanced Pitta
A balanced pitta is an indication of sound physical and psychological health of an individual. When in balance pitta ensures:
• Good digestion
• Energy
• Goal-setting inclinations
• Good problem-solving skills
• Keen powers of intelligence
• Decisiveness
• Boldness and courage
• Bright complexion
Indications of Imbalanced Pitta
• Acidity, Heartburn
• Fitful sleep, Disturbing dreams, Insomnia
• Diarrhea, Food allergies
• Bad breath, Sour body odor
• Sensitivity to heat, Hot flashes
• Skin rashes, Boils and Acne
• Ulcers, Hot sensations in the stomach or intestines
• Bloodshot eyes other vision problems
• Weakness due to low blood sugar
• Fevers, Night sweats
• Anemia
• Jaundice

Pitta Dosha Foods General:
You can balance excess pitta with foods that are dry, cool and heavy with a mild, naturally sweet, bitter or astringent taste. Milk, beans, rice, steamed vegetables and fruits are good for pitta people. Pitta body types generally like a lot of protein. The sweet items like maple syrup, brown rice syrup, barley malt, and honey are good.
• Mild spices: Coriander, cumin, and cilantro
• Vegetables & Fruits: can eat most vegetables and fruits.
• Grains: Barley, oats, wheat, parboiled rice.
General Tips on Health and Wellness For Pitta
When in balance, pitta promotes intelligence and understanding but when disturbed or imbalanced it produces anger and jealousy. To ensure sound and healthy living one should be aware with the causes and factors that can influence pitta dosha and also the ways to regulate them.
It is very important for Pitta people that they lead a pure and moderate life and try to keep cool. Pitta is a fire element; hence to balance it one should avoid excessive heat, oily, steamy and salty food, rigorous exercises that increase body heat, etc. Such people should opt foods, attitudes, behaviors, personal relationships, and environmental conditions that can be instrumental in balancing pitta.
They should take food that is sweet, bitter, and astringent because these tastes decrease pitta influences, do exercise during the cooler part of the day, and do things that cool the mind, avoid conflicts and choose cool climates. On behavioral front developing the virtues of honesty, morality, kindness, generosity, and self-control also help in balancing pitta dosha.
Pitta prakriti people should do meditation as it helps to control negative thoughts and calm mind and body. Optimum meal times for pitta people are: breakfast at 7 a.m., lunch at noon, a snack at 3 p.m. and dinner at 6 p.m.
The pitta people should use colors that are cool and calm, for example, blues and greens. These colors provide a soothing effect and help to control pitta. The stone should be worn by pitta people is Moonstone as this stone associate well with pitta dosha and drive positive influences.
Pungent and oily foods like curry, fried foods and spicy condiments should be avoided by people with pitta constitutions. Spices such as cayenne, garlic and dry ginger should completely be avoided. Stimulants like alcohol, smoking, coffee, vinegar, fried foods, pickles, spicy foods, fermented foods, almond, curds, corn, til, mustard oil are not good for pitta people. Beets, brinjals, carrots, garlic, hot peppers, onions, spinach, tomatoes need to avoided. Fruits that are to be avoided are like sour and unripe fruits, including grapefruit, papayas, peaches, bananas, apricots. Grains like brown rice, corn, millet, rye should not be taken.
List of favorable food items
Vegetables
Fruits
GrainsDairyMeatOilBeveragesNuts &
Seeds
Herbs&
Spices
Asparagus
Broccoli
Brussels sprouts
Cabbage
Cauliflower
Celery
Cucumber
Green beans
Green (sweet) peppers
Leafy green vegetables
Lettuce
Mushrooms
Okra
Parsley
Peas
Potatoes
Sprouts
Squash
Sweet potatoes
Zucchini
Apples
Avocados
Cherries
Coconut
Figs
Dark grapes
Mangoes
Melons
Oranges
Pears
Pineapples
Plums
Prunes
Raisins
Barley
Oats
Wheat
White rice (prefer basmati rice)
Butter
Egg whites
Ghee (clarified butter )- unless you are watching cholesterol
Ice cream
Milk
Chicken
Shrimp
Turkey
(All in small amounts)
Coconut
Olive
Soy
Sunflower
Almond milk
aloe vera juice
apple juice apricot juice berry juice (sweet) black tea carob
chai (hot, spiced milk)* cherry juice (sweet)
cool dairy drinks
grain “coffee” grape juice
mango juice mixed veg. juice orange juice
peach nectar pomegranate juice prune juice pear juice rice milk soy milk vegetable bouillon
Coconut
Pumpkin seeds
Sunflower seeds
Spices are generally avoided as too heating. In small amounts, the following sweet and astringent spices are OK
Cardamom
Cilantro(green coriander)
Cinnamon
Coriander seed
Dill
Fennel
Mint
Saffron
Turmeric
Plus small amounts of cumin and black pepper
List of unfavorable food items
Vegetables
Fruits
GrainsDairyMeatOilBeveragesNuts &
Seeds
Herbs&
Spices
Beets
Carrots
Eggplant
Garlic
Hot peppers
Onions
Radishes
Spinach
Tomatoes
Apricots
Bananas
Berries
Cherries (sour)
Cranberries
Grapefruit
Papayas
Peaches
Persimmons
Brown rice
Corn
Millet
Rye
Buttermilk
Cheese
Egg yolks
Sour cream
Yogurt
Red meat and sea food in general )
Almond
Corn
Safflower
Sesame
Apple cider berry juice (sour) caffeinated beverages carbonated drinks carrot juice cherry juice (sour) chocolate milk
coffee cranberry juice grapefruit juice
iced tea
iced drinks lemonade papaya juice tomato juice sour juices
All, except mentioned above
All pungent herbs and spices, except as noted. Take only the minimal amounts of the following:
Barbecue sauce
Catsup
Mustard
Pickles
Salt
Sour salad dressings
Spicy condiments
Vinegar
Ayurvedic Herbal Massage to Balance Pitta
Ayurvedic herbal massage is a powerful tool with which you can build greater overall health. People who get ayurvedic herbal massage finds wonderfully relaxing and energizing at the whole time. If you are using ayurvedic herbal massage on daily basis you will find better sleep and easier, earlier mornings and it will help to keep your body free of illness and toxins.
Ayurvedic herbal massage has a wide range of benefits. Ayurvedic herbal massage helps for balance our Kapha dosha, Pitta dosha and Vata dosha. A person who are using ayurvedic herbal massage on daily basis, will get smooth and beautiful skin and always feel youthful. Ayurvedic herbal massage also helps to improve the strength and tone the muscles.

पपीता

अनेक रोग नाशक भी है पपीता
20140105-151054.jpgपपीता एक ऐसा मधुर फल है जो सस्ता एवं सर्वत्र सुलभ है। यह फल प्राय: बारहों मास पाया जाता है। किन्तु फरवरी से मार्च तथा मई से अक्तूबर के बीच का समय पपीते की ऋतु मानी जाती है। कच्चे पपीते में विटामिन ‘ए’ तथा पके पपीते में विटामिन ‘सी’ की मात्रा भरपूर पायी जाती है।
आयुर्वेद में पपीता (पपाया) को अनेक असाध्य रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। संग्रहणी, आमाजीर्ण, मन्दाग्नि, पाण्डुरोग (पीलिया), प्लीहा वृध्दि, बन्ध्यत्व को दूर करने वाला, हृदय के लिए उपयोगी, रक्त के जमाव में उपयोगी होने के कारण पपीते का महत्व हमारे जीवन के लिए बहुत अधिक हो जाता है।
पपीते के सेवन से चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, बालों का झड़ना, कब्ज, पेट के कीड़े, वीर्यक्षय, स्कर्वी रोग, बवासीर, चर्मरोग, उच्च रक्तचाप, अनियमित मासिक धर्म आदि अनेक बीमारियां दूर हो जाती है। पपीते में कैल्शियम, फास्फोरस, लौह तत्व, विटामिन- ए, बी, सी, डी प्रोटीन, कार्बोज, खनिज आदि अनेक तत्व एक साथ हो जाते हैं। पपीते का बीमारी के अनुसार प्रयोग निम्नानुसार किया जा सकता है।
१) पपीते में ‘कारपेन या कार्पेइन’ नामक एक क्षारीय तत्व होता है जो रक्त चाप को नियंत्रित करता है। इसी कारण उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के रोगी को एक पपीता (कच्चा) नियमित रूप से खाते रहना चाहिए।
२) बवासीर एक अत्यंत ही कष्टदायक रोग है चाहे वह खूनी बवासीर हो या बादी (सूखा) बवासीर। बवासीर के रोगियों को प्रतिदिन एक पका पपीता खाते रहना चाहिए। बवासीर के मस्सों पर कच्चे पपीते के दूध को लगाते रहने से काफी फायदा होता है।
३) पपीता यकृत तथा लिवर को पुष्ट करके उसे बल प्रदान करता है। पीलिया रोग में जबकि यकृत अत्यन्त कमजोर हो जाता है, पपीते का सेवन बहुत लाभदायक होता है। पीलिया के रोगी को प्रतिदिन एक पका पपीता अवश्य खाना चाहिए। इससे तिल्ली को भी लाभ पहुंचाया है तथा पाचन शक्ति भी सुधरती है।
४) महिलाओं में अनियमित मासिक धर्म एक आम शिकायत होती है। समय से पहले या समय के बाद मासिक आना, अधिक या कम स्राव का आना, दर्द के साथ मासिक का आना आदि से पीड़ित महिलाओं को ढाई सौ ग्राम पका पपीता प्रतिदिन कम से कम एक माह तक अवश्य ही सेवन करना चाहिए। इससे मासिक धर्म से संबंधित सभी परेशानियां दूर हो जाती है।
५) जिन प्रसूता को दूध कम बनता हो, उन्हें प्रतिदिन कच्चे पपीते का सेवन करना चाहिए। सब्जी के रूप में भी इसका सेवन किया जा सकता है।
६) सौंदर्य वृध्दि के लिए भी पपीते का इस्तेमाल किया जाता है। पपीते को चेहरे पर रगड़ने से चेहरे पर व्याप्त कील मुंहासे, कालिमा व मैल दूर हो जाते हैं तथा एक नया निखार आ जाता है। इसके लगाने से त्वचा कोमल व लावण्ययुक्त हो जाती है। इसके लिए हमेशा पके पपीते का ही प्रयोग करना चाहिए।
७) कब्ज सौ रोगों की जड़ है। अधिकांश लोगों को कब्ज होने की शिकायत होती है। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे रात्रि भोजन के बाद पपीते का सेवन नियमित रूप से करते रहें। इससे सुबह दस्त साफ होता है तथा कब्ज दूर हो जाता है।
८) समय से पूर्व चेहरे पर झुर्रियां आना बुढ़ापे की निशानी है। अच्छे पके हुए पपीते के गूदे को उबटन की तरह चेहरे पर लगायें। आधा घंटा लगा रहने दें। जब वह सूख जाये तो गुनगुने पानी से चेहरा धो लें तथा मूंगफली के तेल से हल्के हाथ से चेहरे पर मालिश करें। ऐसा कम से कम एक माह तक नियमित करें।
९) नए जूते-चप्पल पहनने पर उसकी रगड़ लगने से पैरों में छाले हो जाते हैं। यदि इन पर कच्चे पपीते का रस लगाया जाए तो वे शीघ्र ठीक हो जाते हैं।
१०) पपीता वीर्यवर्ध्दक भी है। जिन पुरुषों को वीर्य कम बनता है और वीर्य में शुक्राणु भी कम हों, उन्हें नियमित रूप से पपीते का सेवन करना चाहिए।
११) हृदय रोगियों के लिए भी पपीता काफी लाभदायक होता है। अगर वे पपीते के पत्तों का काढ़ा बनाकर नियमित रूप से एक कप की मात्रा में रोज पीते हैं तो अतिशय लाभ होता है।

Dandruff

Dandruff is the most commonest complaint what most of us are suffering from.There are many causes for this.
- dry scalp
- infection of the scalp
-fungal; infection due to unhyginic condition
-use of strong chemicals
-using some others comb
-unhyginic condition
-greasiness of hair and scalp which in turn gives shealter to the dirt and other bacteria to grow…..
Many more causes
Treatment:
__________
1.The best said folklore treatment is application of the paste of onion to the scalp and keep it for about 30-60 minutes
2.Application of the paste of neem leaves.
3.Soak dried methi seeds in water overnight and then make a paste of this and apply it to the scalp.This not only helps in danruff conditions but also helps in hairfall and also helps in new hairgrowth and leaves back the shiny nature of hair and make haircolour black
4.Application of aloevera pulp is also beneficial
5.Paste of hibiscus also helps in strenghtening the hair roots and removed dead cells in the scalp.
6.Application of sour curds acts as a conditioner and also helps in dandruff
7.Take a cup of sour buttermilk to it add powdered gooseberry then allow it to soak for 5-10 mins .Apply this to the scalp and keep for 20 mins.this helps a lot.
8.Internally i advice to take nimbadi guggulu and arogyavardhini rasa.This will be a complete treatment.
9.Mear application of coconut oil is also a good medication
10.avoid using heavy conditioner,and strong shampoos.
11.application of limejuice to the scalp in every 15 days cures this problem .This should be done atleast for 4-6 times to get a beneficial result.
12.Try using cleaned comb always after heat bath.
13.Apply luke warm oil always to the scalp and massage gently for about 10 mins in circular fashion and then apply all the above pastes for better and quick results.
14.Make a dilute tea decoction add lemon juice with peals and bring to a boil.After cleaning your hair wash with this liquid .This prevents greying of hair and also gives natural shine to the hair.
15.a cup of warm milk added with a spoon ful of honey taken during the bed time helps in a sound sleep and also leads to jet blackand thick hair.
16.Application of thick paste of mint with little tulsi to the scalp after oilingshows very good results in case of dandruff and leads to sound sleep also.
17.Fresh leaves of coriander should be blended into a paste using water and applied to the scalp and hair once in a week atleast.This shows wonderful results in case of hairfall.It leave sthe hair colour darkblack,and even shiny.
18.Application of lemon juice to scalp ie clean scalp also proves beneficial.Ie. should be done next day of hair wash
19.application of dhurdoora patra thailam is very beneficial .

शतावरी

शतावरी
सौ रोगों को हरने वाली शतावरी
आज हम आपको एक झाड़ीनुमा लता के बारे में बताते है , जिसमें फूल मंजरियों में एक से दो इंच लम्बे एक या गुच्छे में लगे होते हैं और फल मटर के समान पकने पर लाल रंग के होते हैं ..नाम है “शतावरी” ..I
आपने विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में इसके प्रयोग को अवश्य ही जाना होगा ..अगर नहीं तो हम आपको बताते हैं, इसके प्रयोग को ..! आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार , शतावर पुराने से पुराने रोगी के शरीर को रोगों से लड़ने क़ी क्षमता प्रदान करता है …I इसे शुक्रजनन,शीतल ,मधुर एवं दिव्य रसायन माना गया है I महर्षि चरक ने भी शतावर को बल्य और वयः स्थापक ( चिर यौवन को बरकार रखने वाला) माना है.I आधुनिक शोध भी शतावरी क़ी जड़ को हृदय रोगों में प्रभावी मान चुके हैं I
अब हम आपको शतावरी के कुछ आयुर्वेदिक योग क़ी जानकारी देंगे ..जिनका औषधीय प्रयोग चिकित्सक के निर्देशन में करना अत्यंत लाभकारी होगा …!!
- यदि आप नींद न आने क़ी समस्या से परेशान हैं तो बस शतावरी क़ी जड़ को खीर के रूप में पका लें और थोड़ा गाय का घी डालें ,इससे आप तनाव से मुक्त होकर अच्छी नींद ले पायेंगे ..!
-शतावरी क़ी ताज़ी जड़ को यवकूट करें ,इसका स्वरस निकालें और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें,हो गया मालिश का तेल तैयार …इसे माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लगायें और लाभ देखें I
-यदि रोगी खांसते-खांसते परेशान हो तो शतावरी चूर्ण – 1.5 ग्राम ,वासा के पत्ते का स्वरस 2.5 मिली ,मिश्री के साथ लें और लाभ देखें I
-प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने क़ी समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण -पांच ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है ..!
-यदि पुरुष यौन शिथिलता से परेशान हो तो शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है I
-यदि रोगी को मूत्र या मूत्रवह संस्थान से सम्बंधित विकृति हो तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है I
-शतावरी के पत्तियों का कल्क बनाकर घाव पर लगाने से भी घाव भर जाता है …!
-यदि रोगी स्वप्न दोष से पीड़ित हो तो शतावरी मूल का चूर्ण -2.5 ग्राम ,मिश्री -2.5 ग्राम को एक साथ मिलाकर …पांच ग्राम क़ी मात्रा में रोगी को सुबह शाम गाय के दूध के साथ देने से प्रमेह ,प्री -मेच्युर -इजेकुलेशन (स्वप्न-दोष ) में लाभ मिलता है I
-गाँव के लोग इसकी जड़ का प्रयोग गाय या भैंसों को खिलाते हैं, तो उनकी दूध न आने क़ी समस्या में लाभ मिलता पाया गया है …अतः इसके ऐसे ही प्रभाव प्रसूता स्त्रियों में भी देखे गए हैं I
-शतावरी के जड के चूर्ण को पांच से दस ग्राम क़ी मात्रा में दूध से नियमित से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है !
-वातज ज्वर में शतावरी के रस एवं गिलोय के रस का प्रयोग या इनके क्वाथ का सेवन ज्वर (बुखार ) से मुक्ति प्रदान करता है ..I
-शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन ,दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारीयों में लाभ मिलता है …I
.. शतावरी हिमतिक्ता स्वादीगुर्वीरसायनीसुस्निग्ध शुक्रलाबल्यास्तन्य मेदोs ग्निपुष्टिदा ..!! चक्षु स्यागत पित्रास्य,गुल्मातिसारशोथजित…उदधृत किया है ..तो शतावरी एक बुद्धिवर्धक,अग्निवर्धक,शुक्र दौर्बल्य को दूर करनेवाली स्तन्यजनक औषधि है …!!

क्या है ब्रह्मचर्य

क्या है ब्रह्मचर्य
आयुर्वेद चिकित्सा के साथ-साथ जीवन का विज्ञान है।जीने की कला जिसे हम आज ‘लाईफ स्टाईल’ समझते हैं,इसके बारे में आयुर्वेद के शास्त्रों में खुलेपन के साथ चर्चा की गयी है।हाल ही में गे-सेक्स के पीछे चर्चाओं का बाजार गर्म है और कहीं-कहीं इसे ब्रह्मचर्य से जोड़ने की धृस्टत़ा की जा रही है।मेरा उद्देश्य जनसामान्य के मस्तिष्क में ब्रह्मचर्य से जुडी भ्रांतियों को आयुर्वेद के शास्त्रीय नजरिये से प्रस्तुत करना है। आयुर्वेद में शरीर तीन स्तम्भों पर टिका हुआ माना गया है,जिसके लिए
त्रितय चेदमुपष्टम्भनमाहार : स्वप्नोs ब्रह्मचर्यं च। एभियुर्क्तियुक्तैरूपष्टब्ध मुपस्तम्भै: शरीरं बलवर्णोंपचयो
पचितमनुवर्तते यावादायुष: संस्कार:।।
अष्टांग संग्रह 9/36
अर्थात आहार स्वप्न एवं (अ)ब्रह्मचर्य द्वारा युक्तिपूर्वक इन स्तंभों पर शरीर के टिके होने की बात बतायी गयी है।
आचार्य चरक ने इसे और भी स्पष्ट करते हुये कहा है त्रय उपस्त्मभा:- आहार स्वप्नो,ब्रह्मचर्यमिती।
सन्दर्भ:चरक संहिता सूत्र स्थान :11/32
दोनों ही सन्दर्भों से इतना तो स्पष्ट है की युक्तिपूर्वक ब्रह्मचर्य-अब्रह्म्चर्य जिसे सम्यक या संयमित अब्रह्म्चर्य एवं ब्रह्मचर्य समझा जा सकता है के बीच संतुलन को आवश्यक माना गया है।
अब आपके मन में यह प्रश्न आ रहा होगा की भई आहार और नींद तो समझ में आ गया पर ये ब्रह्मचर्य-अब्रह्म्चर्य क्या बला है?
आईये अब ब्रह्मचर्य को आयुर्वेद के शास्त्रीय नजरिये से समझने का प्रयास करते हैं।गृहस्ताश्रम में रहकर युक्तिपूर्वक संयमित होकर सहवास को संतानोत्पत्ति हेतु आवश्यक माना गया है,सीधे शब्दों में कहा जाय तो संतानुत्पत्ति की कामना से किया गया संसर्ग अब्रह्मचर्य के अंतर्गत आता है और यह आवश्यक माना गया है। यानि जीवन की गाडी को सही तरीके से चलाने के लिये दोनों ही में संतुलन (ब्रह्मचर्य एवं अब्रह्म्चर्य) आवश्यक हैं।अर्थात मर्यादाओं की सीमा में शारीरिक आवश्यतानुसार किया गया सेक्स (अब्रह्म्चर्य) भी उतना ही आवश्यक है जितना की ब्रहमचर्य।
आगे कहा गया है कि
कायस्य तेजः परमं हि शुक्रंमाहारसा दपि सारभूतं।
जित्तात्मना तत्परिरक्षणीयं ततो वपु :
संतातिरप्युदरा।।
सन्दर्भ: अष्टांग सं.सू.9/84
अर्थ है की शरीर का उत्कृष्ट तेज शुक्र है और यह आहार रस आदि का सारभूत है ।जितात्मा बनकर हमें इसकी रक्षा करनी चाहिये जिससे शरीर एवं संतान उत्कृष्ट उत्पन्न हो ।
‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाप्घ्नत:’
सन्दर्भ:वेद
अर्थ है ब्रह्मचर्य रूपी तप से देवताओं ने अमरत्व को प्राप्त किया।
पुनः आचार्य चक्रपाणी ने
‘ब्रह्मचर्य शब्देन इन्द्रिय संयमसौमनस्यप्रभृत यो ब्रह्मज्ञाना नुगुणा गृह्यन्ते’
अर्थात इन्द्रियों को संयमित रखना साथ ही ब्रह्मज्ञान के अनुकूल गुणों को ग्रहण करना ही ब्रह्मचर्य माना है।
कहा गया है:
स्मरणं कीर्तनं केली: प्रेक्षण म गुह्यभाषणम ।
संकल्पोsध्यव्सायश्च क्रिया निवृतिरेव च।।
ए तन्मैथुनम्ष्टांग प्रवदन्ति मनीषीणः।
अप्रमतो भजेद भावांस्तदात्वसुख संज्ञकान।
सुखोदकर्षे सज्जेत देहस्यतदलं हितम।
सन्दर्भ:अष्टांग संग्रह सू.9/85
शुक्र की रक्षा हेतु व्यक्ति को अष्टमैथुन अर्थात मैथुन का स्मरण,कीर्तन-केलि,प्रेक्षण और गुह्यभाषण करने से बचना चाहिए ,संकल्प सहित अध्यवसाय एवं उपरोक्त क्रिया से निवृत रहना भी आवश्यक है,आगे यह भी कहा गया है कि तत्काल शारीरिक एवं मानसिक सुख के लिये आहार निद्रा एवं मैथुन का सेवन सदा सावधानी से करना चाहिये एवं अच्छे परिणाम देनेवाले पदार्थों का सम्यक रूप से आश्रय लेना चाहिये।
इसके अलावा शास्त्रों में मैथुन के योग्य ,अयोग्य,मैथुन विधि,मैथुन की मात्रा,अतिमैथुन के दुष्प्रभाव इससे उत्पन्न रोग आदि का विस्तृत वर्णन किया है जिसकी चर्चा कभी और करेंगे ,सीधा है की मैथुन को आहार,नींद की भाँती सम्यक रूप से उद्देश्य प्राप्ति हेतु से किये जाने को ही अब्रह्म्चर्य के रूप में भी निर्देशित किया गया है। स्पष्ट अर्थों में यह कहा जा सकता है की गृह्स्ताश्रम में ब्रह्मचर्य एवं अब्रह्म्चर्य दोनों का ही परिपालन आवश्यक है।आयुर्वेद में कहीं भी समलैंगिक संबंधों को ब्रह्मचर्य या अब्रह्मचर्य से नहीं जोड़ा गया है अतः इसको किसी भी प्रकार से गे या लेसबीयन संबंधों से जोड़ना महज उपहास का पात्र बनना है।
*सभी सन्दर्भ आयुर्वेद के शास्त्रों से लिये गये हैं जिससे व्यक्ति विशेष असहमत या सहमत होने के लिये स्वतंत्र है। कुछ विचार मेरे निजी हो सकते हैं जिनसे सहमत होना या न होना आवश्यक है आप अपने विचारों को अपनी प्रतिक्रया के माध्यम से पोस्ट कर सकते हैं जिनका स्वागत है

GINGER/ अदरख - Helps fight cancer

अदरख:कैंसर रोगियों के लिये एक बेहतरीन औषधि !

आयुर्वेद महान है यह बात अकाट्य सत्य है ,क्यूंकि यह ज्ञान ऋषियों -आचार्यों एवं संहिताकारों की विद्वता से सदैव पुष्पित एवं पल्लवित होता रहा हैI आयुर्वेद में वर्णित चिकित्सा के सिद्धांत जितने शाश्वत हैं उतने ही शास्त्रोक्त औषधियों के गुण धर्म भी ,बस फर्क इतना है कि जिन बातों को हम आज के वैज्ञानिक शोध द्वारा प्रमाणित कर रहे हैं, वे शायद सदियों पूर्व ही हमारे आचार्यों की दिव्य नजरिये से पुष्ट थी। चलिये कहीं आप इसे मेरी अतिशयोक्ति न समझ लें ,लेकिन मैंने इसके कई प्रमाण अपने लेखों के माध्यम से प्रस्तुत किये हैं और आज इसी कड़ी में एक नये शोध को जोड़ने जा रहा हूँI एक छोटा सा उदाहरण पुनः आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ Iआप और मैं से शायद ही कोई हो जिसने आयुर्वेद के माधयम से अदरख के गुणों को नहीं जाना हो। चाहे हो सूखी खांसी या हो भूख न लगने की समस्या ,कहीं न कहीं यह किसी न किसी रूप में यह हमारे स्वास्थ्य से सम्बंध तो रखता ही है..सूखे स्वरुप में सौंठ (शुंठी ) से बेहतर इसका उदाहरण कोई हो ही नहीं सकता हैI अब आप मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नए शोध को ही ले लीजिये, जो इस बात को साबित कर रहा है कि अदरख की जड़ महज ओवेरियन कैंसर कोशिकाओं को ही नष्ट नहीं करती बल्कि यह बगैर दुष्प्रभाव के प्रोस्टेट कैंसर कोशिकाओं को भी नष्ट करती है ,यानि ओवेरियन एवं प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित रोगियों के लिए जीरो दुस्प्रभाव वाली कीमोथेरैपी ! है न मजे की बात Iयह शोध हाल ही में अमेरीकन एसोसिएशन फार कैंसर रिसर्च के एक सत्र में प्रस्तुत किया गया है Iसबसे कमाल की बात यह है कि जब भी कैंसर कोशिकाओं का सामना अदरख के चूर्ण से कराया गया ,ये कोशिकाएं नष्ट होती चली गयी,वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘एपोपटोसिस’ यानिकोशिकाओं की आत्महत्या कहा जाता है, इतना ही नहीं अदरख की मौजूदगी भर से ये कैंसर कोशिकाएं एक दूसरे का भक्षण करने लग गयीं जिसे विज्ञान की भाषा में ‘आटोफ़ेगी’ नाम दिया जाता है ,मतलब यह हुआ कि ओवेरियन एवं प्रोस्टेट कैंसर पीड़ित रोगियों के लिए अदरख एक प्राकृतिक कीमोथेरेप्यूटिक एजेंट का कार्य करता है Iब्रिटिश जर्नल आफ न्यूट्रीशन में प्रकाशित एक अन्य अमेरीकी शोध के अनुसार अदरख का एक्सट्रेक्ट प्रोस्टेट ट्यूमर के आकार को 56 % तक कम कर देता है ,सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि यदि कहीं रोगी धोखे से इसकी अधिक मात्रा भी प्रयोग कर ले तो अन्य कीमोथेरेप्यूटिक दवाओं की तरह घातक परिणामों का कोई ख़तरा नहीं है I मेरा यह मानना है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया भर में प्रोस्टेट एवं ओवेरियन कैंसर पीड़ित रोगियों के लिए अदरख एक बेहतर कीमोथेरेप्यूटिक विकल्प के रूप में सामने होगा I

Agni-Digestive power.

You are not what you eat…. You are what you digest
PictureOne concept that is central to Ayurvedic medicine is the concept of Agni, or digestive fire. Imagine that there is a small fire burning within your lower stomach and small intestine. The goal is to keep this fire stoked without letting it get too big or smothering it to death. We all digest food differently. If someone drinks a raw green smoothie, for some it can be like throwing a huge wet log on top of the fire and extinguishing it. This can cause all sorts of problems in the body. Others who have a very strong agni, and drink the smoothie in the proper season might be able to digest it just fine.

How can you tell if you are digesting your food properly? After eating, one should feel content, satisfied and energized. Your bowel movements will be well formed and timely, and you will feel hungry shortly after waking up in the morning. If you are experiencing lethargy, exhaustion, or pain and discomfort after eating, you are not digesting your food properly. Other indications that your food may not be digesting well can be: constipation, diarrhea, lack of appetite and an overall feeling of sluggishness.


Along with determining how to eat properly for one’s unique constitution or dosha, agni is the most important factor in determining how and what we should be eating. One’s agni can become compromised by overeating, under-eating, eating the same foods year round regardless of season change, drinking too much water with meals, staying up late, eating at irregular times, and lack of exercise.

Here are a few tips and tricks to help keep your agni balanced.


  • Follow your body’s own signals. If you are not hungry, don’t eat.
  • Resist the urge to snack throughout the day if you are not hungry. Your body needs time to digest your previous meal before you feed it again.
  • It is best to wait at least 2-3 hours after you eat to exercise, otherwise your food doesn’t have time to fully digest.
  • Try to eat in a relaxed, quiet atmosphere. This includes computers and phones! Enjoy a mini-vacation by unplugging while you eat.
  • It is important to eat the foods that are balancing for your body type, seasonally appropriate, and in proper proportions. And don’t forget, is also important to enjoy the taste of what you are eating!


Almond

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1. Almonds help to keep cholesterol levels low.
2. Almond milk is also available, and is good for the skin, besides being a nourishing and useful substitute for people who are allergic to milk.
3. In addition, almonds themselves can also be used in many home treatments for the skin.
4. You can soak almonds for a few hours, then grind them, and use this paste with milk or rose water as an excellent face scrub.
5. A reduced risk of heart attacks. This is a health benefit of the cholesterol regulating property of almonds.
6. A source of fiber. Fiber is good for your digestive tract. It also fills you up, making a snack of few almonds a healthy choice if you’re on a diet.
7. A good source of protein. Protein is good for your muscles, skin and for natural hair care from the inside out.

Suvarna Prashan – An Ayurveda Immunization

images (2)Soil of India – tradition culture if India gave us many Great Philosophers, saints, Intellectuals, bravery heroes and great scientists.
Do we think ever how can they maintain this tradition to produce such heroes? How they bring up them? For making such unbelievable characters like Ram, Krishna, Yagnvalkay, Vishvamitra, Panini, Sushrut, Charak, vagbhatt, Abhimanyu, Vashishtha, Valmiki, Saint Tulsidas, saint Ramdas, Swamy Vivekanand and many more.
Ayurveda has given bunch of Medical principles and effective medical treatment systems which are truly effective till now and eternal.
In modern science many research works are continuous in work but the result of their conclusions is not permanent. Once they conclude one thing as nectar then after five years they blame that as a poison and make that drugs as banned.
Vaccine is invented in near past, but the basic idea of vaccine is described in Indian medical science – Ayurveda but we don’t know about it.
Different vaccines for different diseases are our recent vaccine concept. It can prevent only those diseases which it made for. Our body has self resistance power for preventing from various diseases, which is called by immunity. When it is finished then we become ill. Our body can produce immunity itself and vaccine helps to make it faster. Modern Science has prevented several vaccines for several diseases and it is continually moving.
The same principles of vaccine (improving immunity) were described in Ayurveda thousand years ago.
If our body has sufficient immunity not a single infection or epidemic can affect us.
Therefore, Ayurveda gifted us Suvarnaprashan to improve immunity of Child.
‘Suvarna’ means ‘Gold’ and ‘Prashan’ means ‘to lick’. Licking of Gold towards a child from birth to childhood mean up to twelve years called as ‘Suvarnaprashan’.
Ayurveda’s authorized Book- Kashyap Sanhita indicate to do “Suvarnaprashan” to every new born child.Its ingredient are Vacha, Shankhpushpi, Brahmi, Ashwagandha and Gold bhasma, all r processed in cow ghee and honey.
here is wat ancient text says—>>
“…..मधु सर्पिभ्यम लेहयेत कनकं शिशु: I

सुवर्णप्राशनं ह्येतान्मेदाग्नी बलावार्धनाम II

आयुष्यं मंगलम पुण्यं वृश्यम वर्ण्यम ग्रहापहम I

परम मेधावी व्याधिभिरना च घ्रुश्यते II
…. सुवर्णप्राशनाद भवेत् ”I
its said lik this also - सुवर्ण प्राशन हि एतत् मेधा अग्नि बल वर्धनं I आयुष्यं मन्गलं पुण्यं वृष्यं ग्रहापहं II
मासात् परम मेधावे व्याधिर्भिर्न्न च द्रुष्यते I षड्भिर्मासै श्रुतधर सुवर्नप्राशाद भवेत् II
Suvarnaprashan improves Intelligence, Digestive fire, physical power. It gives long, spiritual, holy and saintly life. It gives rejuvenative effects and tone ups the skin.
It improves immunity in miracle way so child is prevented by bacterial and viral infections.
Regular use of Suvarnaprashan up to one month is results that the child gets best immunity to defeat diseases.
six months of regular use of Suvarnaprashan make child very intelligent, and he can remember all heard by him, means it improves memory and intelligence in so much amount.
Suvarnaprashan also improves the digestion power and it results to the child’s improvement of physical stamina. It glows the skin tone. In short Suvarnaprashan is a best element to prevent child. And any illness can not touch him early.
It is….
Strong immunity Enhancer: Suvarnaprashan builds best resistant power and prevents from infections and makes child stronger.
Physical development: Suvarnaprashan helps in physical development of your child.
Memory Booster: It contains such Herbs which help your child for memory boosting and it improves Grasping Power also.
Makes child active and Intellect

• Digestive Power:
Suvarnaprashan is a best appetizer and have digestive properties also.
Tone ups Skin color.
After understanding the importance of Suvarnaprashan one of the Sanskar among the sixteen Sanskar of Indian traditions; any one has considering each child at least once in life.
How and where to get it?
Here at our Clinic we do this Suvarna prashan for d age group of new born to 12 yr baby boys n girls on every Pushya Nakshatra.
So you can get it from our center or via courier by advance order. you will also appreciates its miracle results after using it. Dosage is varying to the age factor which mentioned by us case to case.
Why is Gold?
  • Gold is best metal for human body. It is not only effective in children but it is also more effective on all ages’ males and females.
  • Gold is the best medicine to improve immunity power in our body.
  • It is most important and valuable metal by its significant impact on our body and mind.
  • As Indian scriptural it is the best element have to donate to love ones.
  • Gold must have be absorb in our body to make it healthy, the result of this thought Gold Jewels are most famous in Indian culture. If any youngster wear fake jewelry the elders always scolding because of they knows the effect of the Gold. As per this thought our ancient kings and the richest person of the town were always eat in Gold plates. To wear Gold, to eat in Gold plate, to donate Gold, collection of Gold all are the concept to intake Gold to our body.
  • Gold is very valuable metal which used for the body, mind and intelligence protection. Therefore from past to recent time our economy depends on Gold only. It is the Sign of Gold’s effectiveness in our life also.
‘Suvarnaprashan’ when and to whom?
  • Suvarnaprashan is one of the sixteen ‘Sanskar’ (rituals) which described in Ancient Indian Scriptural.
  • When any child is born in our home; licking him honey by Gold stick and have to write ‘AUM’ is our tradition. The base of this tradition is originally coming from ‘Suvarnaprashan Sanskar’.
  • To lick Gold to the child is originally ‘Suvarnaprashan’. When it is done by everyone, but no one knows that why we do this type of things and what is the effect to the child?
  • Existence of this tradition after thousands of years is shows the constant efforts of our Rushis – our ancient saints. But we never get a single effort to understand this tradition and a miracle vision of our ancients. ‘Suvarnaprashan’ is a mixture of Gold, such nice herbs, cow ghee and honey.
  • As per Indian tradition if we makes in specific time (Pushya Naxatra) it will be more effective. Suvarnaprashan is given to newborn to twelve years aged children. Any one can get benefits of it by starting any time up to twelve years of age.By choosing this kit you will give precious gift to your child

Ayurveda-home therapy.

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Do you know that the majority of Indian still uses some traditional medicines for variety of ailments? India has a very long tradition of treatment of ailments using alternative medicines.
The whole tradition is very ancient and systematic. It dates back to more around 4000 years, when the Vedas (र्वेद – ancient books of Indian knowledge, wisdom and culture) where supposedly written. The traditional medicines comes under one of four Vedas called Atharvaveda. Under Atharvaveda comes Ayurveda (आयुर्वेद) means the knowledge for long life. The account of traditional medicines are found in Sanskrit works such as Suśruta Saṃhitā and the Charaka Saṃhitā. These two works laid the foundation of Ayurveda. Since then, diagnosis of new diseases and healing methods were added.
In the early works, Ayurveda had considered that Universe including Human body is made of five elements. The five elements are Pṛthvī (पृथ्वी – earth), Jala (जल – water), Agni (अग्नि – fire), Vāyu (वायु – air) and Ākāśa (आकाश – Sky). It stresses a balance of three elemental energies such as Vāyu Vāta (वायु वत – air & space – “wind”), Pitta (पित्त – fire & water – “bile”) and Kapha (कफ – water & earth – “phlegm”).
Ayurveda is considered as the science of following eight components.
1.Internal medicine (काय चिकित्सा – Kāya-cikitsā)
2. Paediatrics (Kaumārabhṛtyam)
3. Surgery (Śalya-cikitsā)
4. Eye and ENT (Śālākya tantra)
5. Bhūta vidyā or in modern terms, Psychiatry.
6. Toxicology (Agadatantram)
7. Prevention of diseases and improving immunity and rejuvenation (Rasayana)
8. Aphrodisiacs and improving health of progeny (Vajikaranam)
It is well known that people in ancient India were well versed with highly systematic systems of the alternative medicines and surgery. Many disease such as fever, cough, consumption, diarrhea, dropsy, abscesses, seizures, tumours, and skin diseases (including leprosy) etc. were classified. Treatment of complex ailments, including angina pectoris, diabetes, hypertension, and stones were also found and documented. Early works of Ayurveda such as Charaka Samhita, is dedicated to Charakas. Plastic surgery is documented as well in these ancient Indian texts. Plastic surgery of nose, ear lobes, lips for restruction of nose, ears, lips etc were given by an ayurvedic physician called Sushruta, who is now considered the father of rhinoplasty.
The works of Ayurveda were later become known to Chinese and Arabs through trade and pilgrim from these regions. Further, Arabs subsequently transmitted the ayurvedic knowledge to Europe. The knowledge of Ayurveda might be known by some another name outside India but we can imagine how it has shaped the understanding and use of alternative medicines across the world.

Monday, April 7, 2014

जीरो दिया भारत ने

जब जीरो दिया भारत ने ; दुनिया को तब गिनती आई
 Photo: जब जीरो दिया मेरे भारत ने ; दुनिया को तब गिनती आई

देता ना दशमलव भारत तो; यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था।

शून्य यानी कुछ भी नहीं -आकाश या स्पेस। पर यह एक अंक भी है।जब किसी अन्य अंक के सामने लगा दे तो यह बढ़ता ही जाता है।यह है शून्य से सृष्टि की रचना।जब किसी अंक को शून्य से भाग दे तो अनंत प्राप्त होता है।शून्य एक दार्शनिक अवधारणा  भी है और शून्य से ही विज्ञान के आविष्कार भी है।

रोमन अंकों में शून्य ना होने से वे कितने जटिल लगते है। उनका जोड घटाव , गुणा -भाग कितना मुश्किल लगता है।शून्य लग जाने से दस दस के समूह में संख्या गिनना कितना आसान हो जाता है। इसी तरह दशमलव से सूक्ष्म से सूक्ष्म संख्या की गणना संभव हो जाती है। इस तरह यह संसार जितना सूक्ष्मतिसूक्ष्म है उतना ही विशाल -महाविशाल है। इसकी गणना के लिए दशमलव और शून्य की अवधारणा की गई।

किसी भी अंक में शून्य जोड़ो या घटाओ तो वह उतना ही रहेगा और उसे शून्य से गुणा  करे तो वह भी शून्य बन जाता है। पर शून्य से भाग देने पर वह अनंत हो जाता है।इसका अर्थ है अपने कर्मों में पुण्य कर्म जोड़ो या घटाओ कलयुग में फर्क नहीं पडेगा।  कइ बार जोड़ने यानी गुणा करने पर भी नतीजा शून्य यानी और भी निराशाजनक हो सकता है। पर उन कर्मो को भगवान को अर्पित कर देने से यानी शून्य से भाग देने पर नतीजा अनंत होता है।इस तरह शून्य एक  दर्शन है जिसे जितना सोचा जाए उतना ही विशाल लगता है।

सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने कहा 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिये (उसके) आगे (शून्य) रखो। और शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धांत का उद्गम रहा होगा। आर्यभट्ट द्वारा रचित गणितीय खगोलशास्त्र ग्रंथ 'आर्यभट्टीय' के संख्या प्रणाली में शून्य तथा उसके लिये विशिष्ट संकेत सम्मिलित था (इसी कारण से उन्हें संख्याओं को शब्दों में प्रदर्शित करने के अवसर मिला)। प्रचीन बक्षाली पाण्डुलिपि में, जिसका कि सही काल अब तक निश्चित नहीं हो पाया है परंतु निश्चित रूप से उसका काल आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है, शून्य का प्रयोग किया गया है और उसके लिये उसमें संकेत भी निश्चित है। उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि भारत में शून्य का प्रयोग ब्रह्मगुप्त के काल से भी पूर्व के काल में होता था।

शून्य तथा संख्या के दशमलव के सिद्धांत का सर्वप्रथम अस्पष्ट प्रयोग ब्रह्मगुप्त रचित ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में पाया गया है। इस ग्रंथ में ऋणात्मक संख्याओ (negative numbers) और बीजगणितीय सिद्धांतों का भी प्रयोग हुआ है। सातवीं शताब्दी, जो कि ब्रह्मगुप्त का काल था, शून्य से सम्बंधित विचार कम्बोडिया तक पहुँच चुके थे और दस्तावेजों से ज्ञात होता है कि बाद में ये कम्बोडिया से चीन तथा अन्य मुस्लिम संसार में फैल गये।

इस बार भारत में हिंदुओं के द्वारा आविष्कृत शून्य ने समस्त विश्व की संख्या प्रणाली को प्रभावित किया और संपूर्ण विश्व को जानकारी मिली। मध्य-पूर्व में स्थित अरब देशों ने भी शून्य को भारतीय विद्वानों से प्राप्त किया। अंततः बारहवीं शताब्दी में भारत का यह शून्य पश्चिम में यूरोप तक पहुँचा।

भारत का 'शून्य' अरब जगत में 'सिफर' (अर्थ - खाली) नाम से प्रचलित हुआ। फिर लैटिन, इटैलियन, फ्रेंच आदि से होते हुए इसे अंग्रेजी में 'जीरो' (zero) कहते हैं।

सर्वनन्दि नामक दिगम्बर जैन मुनि द्वारा मूल रूप से प्रकृत में रचित लोकविभाग नामक ग्रंथ में शून्य का उल्लेख सबसे पहले मिलता है। इस ग्रंथ में दशमलव संख्या पद्धति का भी उल्लेख है।


 देता ना दशमलव भारत तो; यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था।

शून्य यानी कुछ भी नहीं -आकाश या स्पेस। पर यह एक अंक भी है।जब किसी अन्य अंक के सामने लगा दे तो यह बढ़ता ही जाता है।यह है शून्य से सृष्टि की रचना।जब किसी अंक को शून्य से भाग दे तो अनंत प्राप्त होता है।शून्य एक दार्शनिक अवधारणा भी है और शून्य से ही विज्ञान के आविष्कार भी है।

रोमन अंकों में शून्य ना होने से वे कितने जटिल लगते है। उनका जोड घटाव , गुणा -भाग कितना मुश्किल लगता है...।शून्य लग जाने से दस दस के समूह में संख्या गिनना कितना आसान हो जाता है। इसी तरह दशमलव से सूक्ष्म से सूक्ष्म संख्या की गणना संभव हो जाती है। इस तरह यह संसार जितना सूक्ष्मतिसूक्ष्म है उतना ही विशाल -महाविशाल है। इसकी गणना के लिए दशमलव और शून्य की अवधारणा की गई।

किसी भी अंक में शून्य जोड़ो या घटाओ तो वह उतना ही रहेगा और उसे शून्य से गुणा करे तो वह भी शून्य बन जाता है। पर शून्य से भाग देने पर वह अनंत हो जाता है।इसका अर्थ है अपने कर्मों में पुण्य कर्म जोड़ो या घटाओ कलयुग में फर्क नहीं पडेगा। कइ बार जोड़ने यानी गुणा करने पर भी नतीजा शून्य यानी और भी निराशाजनक हो सकता है। पर उन कर्मो को भगवान को अर्पित कर देने से यानी शून्य से भाग देने पर नतीजा अनंत होता है।इस तरह शून्य एक दर्शन है जिसे जितना सोचा जाए उतना ही विशाल लगता है।

सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने कहा 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिये (उसके) आगे (शून्य) रखो। और शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धांत का उद्गम रहा होगा। आर्यभट्ट द्वारा रचित गणितीय खगोलशास्त्र ग्रंथ 'आर्यभट्टीय' के संख्या प्रणाली में शून्य तथा उसके लिये विशिष्ट संकेत सम्मिलित था (इसी कारण से उन्हें संख्याओं को शब्दों में प्रदर्शित करने के अवसर मिला)। प्रचीन बक्षाली पाण्डुलिपि में, जिसका कि सही काल अब तक निश्चित नहीं हो पाया है परंतु निश्चित रूप से उसका काल आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है, शून्य का प्रयोग किया गया है और उसके लिये उसमें संकेत भी निश्चित है। उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि भारत में शून्य का प्रयोग ब्रह्मगुप्त के काल से भी पूर्व के काल में होता था।

शून्य तथा संख्या के दशमलव के सिद्धांत का सर्वप्रथम अस्पष्ट प्रयोग ब्रह्मगुप्त रचित ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में पाया गया है। इस ग्रंथ में ऋणात्मक संख्याओ (negative numbers) और बीजगणितीय सिद्धांतों का भी प्रयोग हुआ है। सातवीं शताब्दी, जो कि ब्रह्मगुप्त का काल था, शून्य से सम्बंधित विचार कम्बोडिया तक पहुँच चुके थे और दस्तावेजों से ज्ञात होता है कि बाद में ये कम्बोडिया से चीन तथा अन्य मुस्लिम संसार में फैल गये।

इस बार भारत में हिंदुओं के द्वारा आविष्कृत शून्य ने समस्त विश्व की संख्या प्रणाली को प्रभावित किया और संपूर्ण विश्व को जानकारी मिली। मध्य-पूर्व में स्थित अरब देशों ने भी शून्य को भारतीय विद्वानों से प्राप्त किया। अंततः बारहवीं शताब्दी में भारत का यह शून्य पश्चिम में यूरोप तक पहुँचा।

भारत का 'शून्य' अरब जगत में 'सिफर' (अर्थ - खाली) नाम से प्रचलित हुआ। फिर लैटिन, इटैलियन, फ्रेंच आदि से होते हुए इसे अंग्रेजी में 'जीरो' (zero) कहते हैं।

सर्वनन्दि नामक दिगम्बर जैन मुनि द्वारा मूल रूप से प्रकृत में रचित लोकविभाग नामक ग्रंथ में शून्य का उल्लेख सबसे पहले मिलता है। इस ग्रंथ में दशमलव संख्या पद्धति का भी उल्लेख है।
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बालों का बढ़ना

बालों का बढ़ना

चिकित्सा :

1. अमरबेल : 250 ग्राम अमरबेल को लगभग 3 लीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाये तो इसे उतार लें। सुबह इससे बालों को धोयें। इससे बाल लंबे होते हैं।

2. त्रिफला : त्रिफला के 2 से 6 ग्राम चूर्ण में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लौह भस्म मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बालों का झड़ना बन्द हो जाता है।

3. कलौंजी : 50 ग्राम कलौंजी 1 लीटर पानी में उबाल लें। इस उबले हुए पानी से बालों को धोएं। इससे बाल 1 महीने में ही काफी लंबे हो जाते हैं।...

4. नीम : नीम और बेर के पत्त
ों को पानी के साथ पीसकर सिर पर लगा लें और इसके 2-3 घण्टों के बाद बालों को धो डालें। इससे बालों का झड़ना कम हो जाता है और बाल लंबे भी होते हैं।

5. लहसुन : लहसुन का रस निकालकर सिर में लगाने से बाल उग आते हैं।

6. सीताफल : सीताफल के बीज और बेर के बीज के पत्ते बराबर मात्रा में लेकर पीसकर बालों की जड़ों में लगाएं। ऐसा करने से बाल लंबे हो जाते हैं।

7. आम : 10 ग्राम आम की गिरी को आंवले के रस में पीसकर बालों में लगाना चाहिए। इससे बाल लंबे और घुंघराले हो जाते हैं।

8. शिकाकाई : शिकाकाई और सूखे आंवले को 25-25 ग्राम लेकर थोड़ा-सा कूटकर इसके टुकड़े कर लें। इन टुकड़ों को 500 ग्राम पानी में रात को डालकर भिगो दें। सुबह इस पानी को कपड़े के साथ मसलकर छान लें और इससे सिर की मालिश करें। 10-20 मिनट बाद नहा लें। इस तरह शिकाकाई और आंवलों के पानी से सिर को धोकर और बालों के सूखने पर नारियल का तेल लगाने से बाल लंबे, मुलायम और चमकदार बन जाते हैं। गर्मियों में यह प्रयोग सही रहता है। इससे बाल सफेद नहीं होते अगर बाल सफेद हो भी जाते हैं तो वह काले हो जाते हैं।

9. मूली : आधी से 1 मूली रोजाना दोपहर में खाना-खाने के बाद, कालीमिर्च के साथ नमक लगाकर खाने से बालों का रंग साफ होता है और बाल लंबे भी हो जाते हैं। इसका प्रयोग 3-4 महीने तक लगातार करें। 1 महीने तक इसका सेवन करने से कब्ज, अफारा और अरुचि में आराम मिलता है।
नोट : मूली जिसके लिए फयदेमन्द हो वही इसका प्रयोग कर सकते हैं।

10. आंवला : सूखे आंवले और मेंहदी को समान मात्रा में लेकर शाम को पानी में भिगो दें। प्रात: इससे बालों को धोयें। इसका प्रयोग लगातार कई दिनों तक करने से बाल मुलायम और लंबे हो जायेंगे।

11. ककड़ी : ककड़ी में सिलिकन और सल्फर अधिक मात्रा में होता है जो बालों को बढ़ाते हैं। ककड़ी के रस से बालों को धोने से तथा ककड़ी, गाजर और पालक सबको मिलाकर रस पीने से बाल बढ़ते हैं। यदि यह सब उपलब्ध न हो तो जो भी मिले उसका रस मिलाकर पी लें। इस प्रयोग से नाखून गिरना भी बन्द हो जाता है।

12. रीठा
* कपूर कचरी 100 ग्राम, नागरमोथा 100 ग्राम, कपूर तथा रीठे के फल की गिरी 40-40 ग्राम, शिकाकाई 250 ग्राम और आंवले 200 ग्राम की मात्रा में लेकर सभी का चूर्ण तैयार कर लें। इस मिश्रण के 50 ग्राम चूर्ण में पानी मिलाकर लुग्दी (लेप) बनाकर बालों में लगाना चाहिए। इसके पश्चात् बालों को गरम पानी से खूब साफ कर लें। इससे सिर के अन्दर की जूं-लींकें मर जाती हैं और बाल मुलायम हो जाते हैं।
* रीठा, आंवला, सिकाकाई तीनों को मिलाने के बाद बाल धोने से बाल सिल्की, चमकदार, रूसी-रहित और घने हो जाते हैं।

13. गुड़हल : * गुड़हल के फूलों के रस को निकालकर सिर में डालने से बाल बढ़ते हैं।
* गुड़हल के पत्तों को पीसकर लुग्दी बना लें। इस लुग्दी को नहाने से 2 घंटे पहले बालों की जड़ों में मालिश करके लगायें। फिर नहायें और इसे साफ कर लें। इस प्रयोग को नियमित रूप से करते रहने से न केवल बालों को पोषण मिलेगा, बल्कि सिर में भी ठंड़क का अनुभव होगा।
* गुड़हल के पत्ते और फूलों को बराबर की मात्रा में लेकर पीसकर लेप तैयार करें। इस लेप को सोते समय बालों में लगाएं और सुबह धोयें। ऐसा कुछ दिनों तक नियमित रूप से करने से बाल स्वस्थ बने रहते हैं।
* गुड़हल के ताजे फूलों के रस में जैतून का तेल बराबर मिलाकर आग पर पकायें, जब जल का अंश उड़ जाये तो इसे शीशी में भरकर रख लें। रोजाना नहाने के बाद इसे बालों की जड़ों में मल-मलकर लगाना चाहिए। इससे बाल चमकीले होकर लंबे हो जाते हैं।


14. शांखपुष्पी : शांखपुष्पी से निर्मित तेल रोज लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।


15. भांगरा :
* बालों को छोटा करके उस स्थान पर जहां पर बाल न हों भांगरा के पत्तों के रस से मालिश करने से कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं जिनके बाल टूटते हैं या दो मुंहे हो जाते हैं। उन्हें इस प्रयोग को अवश्य ही करना चाहिए।
* त्रिफला के चूर्ण को भांगरा के रस में 3 उबाल देकर अच्छी तरह से सुखाकर खरल यानी पीसकर रख लें। इसे प्रतिदिन सुबह के समय लगभग 2 ग्राम तक सेवन करने से बालों का सफेद होना बन्द जाता है तथा इससे आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
* आंवलों का मोटा चूर्ण करके, चीनी के मिट्टी के प्याले में रखकर ऊपर से भांगरा का इतना डाले कि आंवले उसमें डूब जाएं। फिर इसे खरलकर सुखा लेते हैं। इसी प्रकार 7 भावनाएं (उबाल) देकर सुखा लेते हैं। प्रतिदिन 3 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ सेवन से करने से असमय ही बालों का सफेद होना बन्द जाता है। यह आंखों की रोशनी को बढ़ाने वाला, उम्र को बढ़ाने वाला लाभकारी योग है।
* भांगरा, त्रिफला, अनन्तमूल और आम की गुठली का मिश्रण तथा 10 ग्राम मण्डूर कल्क व आधा किलो तेल को एक लीटर पानी के साथ पकायें। जब केवल तेल शेष बचे तो इसे छानकर रख लें। इसके प्रयोग से बालों के सभी प्रकार के रोग मिट जाते हैं।


16. अनन्तमूल : अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 2-2 ग्राम दिन में 3 बार पानी के साथ सेवन करने से सिर का गंजापन दूर होता है।

17. तिल :
* तिल के पौधे की जड़ और पत्तों के काढ़े से बालों को धोने से बालों पर काला रंग आने लगता है।
* काले तिलों के तेल को शुद्ध करके बालों में लगाने से बाल असमय में सफेद नहीं होते हैं। प्रतिदिन सिर में तिल के तेल की मालिश करने से बाल हमेशा मुलायम, काले और घने रहते हैं।
* तिल के फूल और गोक्षुर को बराबर मात्रा में लेकर घी और शहद में पीसकर लेप बना लें। इसे सिर पर लेप करने से गंजापन दूर होता है।
* तिल के तेल की मालिश करने के एक घंटे बाद एक तौलिया गर्म पानी में डुबोकर उसे निचोड़कर सिर पर लपेट लें तथा ठण्डा होने पर दोबारा गर्म पानी में डुबोकर निचोड़कर सिर पर लपेट लें। इस प्रकार 5 मिनट लपेटे रखें। फिर ठंड़े पानी से सिर को धो लें। ऐसा करने से बालों की रूसी दूर हो जाती है।


और अंत एक बात याद रखे !! किसी भी विदेशी कंपनी का कोई भी शैंपू का प्रयोग मत करे !!
ये clinic all clear,clinic plus, head and shoulder,dove,pantene सब विदेशी कंपनिया बनती है ! और बहुत ही खतरनाक कैमिकलों का प्रयोग करती है ! !! और हर 2 -3 महीने बाद एक ही शैंपू मे थोड़ा बदलाव कर उसका नाम बादल कर फिर बेचने लग जाती है !

आपको मालूम है pantene से एक लड़की के सारे बाल झड़ गये !!और वो खबर अखबार मे भी आई है !!

वो खबर पढ़ने के लिए नीचे दिये गये link पर click करे !!!

http://www.facebook.com/photo.php?fbid=280715125368054&set=a.247926088646958.48221.245769338862633&type=1&theater

CommonWealth Games Scam

Photo: CommonWealth Games Scam

THORIUM CURRUPTION BY CONGRESS.

Photo

पुराणों

Number of Verses in  पुराणों में श्लोकों की संख्या
1. Brahampuran ब्रह्मपुराण: १४००० - (14000)
2. PadamPuran पद्मपुराण: ५५००० - (55000)
3. VishnuPuran विष्णुपुराण: २३००० - (23000)
4. Shiv Puran शिवपुराण: २४००० - (24000)
5. Shri Mad... Bhagwad Puran श्रीमद्भावतपुराण: १८००० - (18,000 )
6. NaradPuran नारदपुराण: २५००० - (25,000)
7. MarkandyaPuran मार्कण्डेयपुराण: ९०००- ( 9,000)
8. Agni Puran अग्निपुराण: १५००० - (15000)
9. Bhavishya Puran भविष्यपुराण: १४५०० - (14500)
10. BrahmVarvatPuran ब्रह्मवैवर्तपुराण: १८००० - (18,000)
11. LingPuran लिंगपुराण: ११००० - (11000)
12. VarahPuranवाराहपुराण: २४००० - (24000)
13. SakandhPuran स्कन्धपुराण: ८११०० - (81100)
14. VamanPuran वामनपुराण: १०००० - (10,000)
15. KaramPuran कूर्मपुराण: १७००० - (17000)
16. MatasyaPuran मत्सयपुराण: १४००० - (14000)
17. GarurPuran गरुड़पुराण: १९००० - (19000)
18. BrahMandPuran ब्रह्माण्डपुराण: १२०००- (12,000)
इस प्रकार सारे पुराणों के श्लोकों की कुल संख्या लगभग ४०३६०० (चार लाख तीन हजार छः सौ) {403600} है. इसके अलावा (RAMAYAN) रामायण में लगभग २४००० (24000) एवं (MAHABHART) महाभारत में लगभग ११०००० (110000) श्लोक हैं

केसर-गंजे लोगों के लिए

इसलिए करें सर्दियों में केसर का उपयोग ------------
Photo: इसलिए करें सर्दियों में केसर का उपयोग ------------
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केसर ठंड में उपयोग की जाने वाली एक बेहतरीन दवा है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार ठंड में रोजाना थोड़ी मात्रा में केसर लेने से शरीर में कई प्रकार के रोग नहीं होते हैं।इसका स्वभाव गर्म होता है। इसलिए औषधि के रूप में 250 मिलिग्राम व खाद्य के रूप में 100 मिलिग्राम से अधिक मात्रा में इसके सेवन की सलाह नहीं दी जाती।

यह एक कामशक्ति बढ़ाने वाला रसायन है। महिलाओं की कुछ बीमारियों में यह रामबाण साबित होता है। बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय की सफाई के लिए कुछ दिनों तक इसका नियमित सेवन करना बहुत अच्छा रहता है। माहवारी के दौरान दर्द, अनियमितता व गड़बड़ी से निजात के लिए यह एक अच्छी औषधि है। मासिक धर्म साफ  लाने वाली, गर्भाशय व योनि संकोचन जैसे रोगों को भी दूर करती है।

केसर त्वचा को सुंदर व निखरा बनाती है। यह शरीर को मजबूत बनाती है। लो ब्लडप्रेशर में ये एक बेहतरीन दवा है। अगर ज्यादा सर्दी-खांसी हो रही हो तो केसर दी जाती है क्योंकि ये कफ का नाश करने वाली औषधि है। मन को प्रसन्न करने वाली रंगीन और सुगन्धित करने वाली होती है। अगर सर्दी लग गई हो तो रात्रि में एक गिलास दूध में एक चुटकी केसर और एक चम्मच शहद डालकर यदि मरीज को पिलाया जाए तो उसे अच्छी नींद आती है। त्वचा रोग होने पर खरोंच और जख्मों पर केसर लगाने से जख्म जल्दी भरते हैं। शिशुओं को अगर सर्दी जकड़ ले और नाक बंद हो जाये तो मां के दूध में केसर मिलाकर उसके माथे और नाक पर मला जाये तो सर्दी का प्रकोप कम होता है और उसे आराम मिलता है।

गंजे लोगों के  लिए तो यह संजीवनी बूटी की तरह कारगर है। जिनके बाल बीच से उड़ जाते हैं, उन्हें थोड़ी सी मुलहठी को दूध में पीस लेना चाहिए। तत्पश्चात् उसमें चुटकी भर केसर डाल कर उसका पेस्ट बनाकर सोते समय सिर में लगाने से गंजेपन की समस्या दूर होती है।रूसी की समस्या हो या फिर बाल झड़ रहे हों, ऐसी स्थिति में भी उपरोक्त फार्मूला अपनाना चाहिए। पुरुषों में वीर्य शक्ति बढ़ाने हेतु शहद, बादाम और केसर लेने से फायदा होता है।

पेट संबंधित बीमारियों के इलाज में केसर बहुत फायदेमंद है। बदहजमी, पेट-दर्द व पेट में मरोड़ आदि हाजमे से संबंधित शिकायतों में केसर का सेवन करने से फायदा होता है।सिर दर्द को दूर करने के लिए केसर का उपयोग किया जा सकता है। सिर दर्द होने पर चंदन और केसर को मिलाकर सिर पर इसका लेप लगाने से सिर दर्द में राहत मिलती है।

卐 !! ॐ आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ॐ !! 卐

卐 !! ॐ आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ॐ !! 卐



केसर ठंड में उपयोग की जाने वाली एक बेहतरीन दवा है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार ठंड में रोजाना थोड़ी मात्रा में केसर लेने से शरीर में कई प्रकार के रोग नहीं होते हैं।इसका स्वभाव गर्म होता है। इसलिए औषधि के रूप में 250 मिलिग्राम व खाद्य के रूप में 100 मिलिग्राम से अधिक मात्रा में इसके सेवन की सलाह नहीं दी जाती।

यह एक कामशक्ति बढ़ाने वाला रसायन है। महिलाओं की कुछ बीमारियों म...ें यह रामबाण साबित होता है। बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय की सफाई के लिए कुछ दिनों तक इसका नियमित सेवन करना बहुत अच्छा रहता है। माहवारी के दौरान दर्द, अनियमितता व गड़बड़ी से निजात के लिए यह एक अच्छी औषधि है। मासिक धर्म साफ लाने वाली, गर्भाशय व योनि संकोचन जैसे रोगों को भी दूर करती है।

केसर त्वचा को सुंदर व निखरा बनाती है। यह शरीर को मजबूत बनाती है। लो ब्लडप्रेशर में ये एक बेहतरीन दवा है। अगर ज्यादा सर्दी-खांसी हो रही हो तो केसर दी जाती है क्योंकि ये कफ का नाश करने वाली औषधि है। मन को प्रसन्न करने वाली रंगीन और सुगन्धित करने वाली होती है। अगर सर्दी लग गई हो तो रात्रि में एक गिलास दूध में एक चुटकी केसर और एक चम्मच शहद डालकर यदि मरीज को पिलाया जाए तो उसे अच्छी नींद आती है। त्वचा रोग होने पर खरोंच और जख्मों पर केसर लगाने से जख्म जल्दी भरते हैं। शिशुओं को अगर सर्दी जकड़ ले और नाक बंद हो जाये तो मां के दूध में केसर मिलाकर उसके माथे और नाक पर मला जाये तो सर्दी का प्रकोप कम होता है और उसे आराम मिलता है।

गंजे लोगों के लिए तो यह संजीवनी बूटी की तरह कारगर है। जिनके बाल बीच से उड़ जाते हैं, उन्हें थोड़ी सी मुलहठी को दूध में पीस लेना चाहिए। तत्पश्चात् उसमें चुटकी भर केसर डाल कर उसका पेस्ट बनाकर सोते समय सिर में लगाने से गंजेपन की समस्या दूर होती है।रूसी की समस्या हो या फिर बाल झड़ रहे हों, ऐसी स्थिति में भी उपरोक्त फार्मूला अपनाना चाहिए। पुरुषों में वीर्य शक्ति बढ़ाने हेतु शहद, बादाम और केसर लेने से फायदा होता है।

पेट संबंधित बीमारियों के इलाज में केसर बहुत फायदेमंद है। बदहजमी, पेट-दर्द व पेट में मरोड़ आदि हाजमे से संबंधित शिकायतों में केसर का सेवन करने से फायदा होता है।सिर दर्द को दूर करने के लिए केसर का उपयोग किया जा सकता है। सिर दर्द होने पर चंदन और केसर को मिलाकर सिर पर इसका लेप लगाने से सिर दर्द में राहत मिलती है।

वन्देमातरम क्या है

जन गण मन अधिनायक जय हे" को पूर्ण प्रतिबंधित कर देना चाहिये । वन्देमातरम को पूर्ण रूप से अपनाना होगा ।

वन्देमातरम बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था ! 1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना वन्देमातरम और उसके बाद जब लोगो ने इसको पढ़ा
तो इसका अर्थ पता चला की वन्देमातरम क्या है !

आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था अँग्रेजी सरकार के विरोध मे और उन राजा महाराजाओ के विरोध मे जो किसी भी संप्रदाय के हो लेकिन अँग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे ! फिर
उसमे उन्होने बगावत की भूमिका लिखी कि अ...ब बगावत होनी चाहिए ! विरोध होना चाहिए ताकि इस अँग्रेजी सत्ता को हम पलट सके ! और इस तरह वन्देमातरम को सार्वजनिक गान बनना चाहिए ये उन्होने घोषित किया !

अँग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर पाबंदी लगाई कई बार इसको जलाया गया !

1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया और भंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे !

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरागी क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया ! तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला ! कि हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग को मंजूर करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए ! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911 मे divison of bangal act वापिस लिया गया ! इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत !

तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया ! अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है ! तो बहिष्कार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है ! यह 6 साल जो आंदोलन चला इस आंदोलन का मूल मंत्र था वन्देमातरम !

उसके बाद क्या हुआ अंग्रेज़ अपने आप को बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे !क्यूंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था ! सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ
बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि
लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया।

रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता
डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए।

रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है

"भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण
भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "

रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कारसे सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था।
टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है।

जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई।
जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। एक दल चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि दूसरे दल वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार
बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण एक नरम दल और एक गरम दल। बन गया गया !
गर्म दल वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया।

जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम
था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)।

उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को
राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे |

बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है-

भारत की संस्कृति

अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने ---

दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष !

तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण !

चार युग - सतयुग, त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग !

चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम !
...
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !

चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद !

चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !

चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !

पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !

पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !

पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश !

छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं उत्तर मिसांसा !

सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !

सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पूरी !

आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !

आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य , भोग , एवं योग लक्ष्मी !

नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री !

दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !

मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि !

बारह मास - चेत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाड़, श्रावन, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष. पौष, माघ, फागुन !

बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , कन्या एवं मीन !

बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर !

पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या !

स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ !