Friday, December 19, 2014

नकसीर (Epistaxis)-

Photo: नकसीर (Epistaxis)-
         नाक में से खून बहने के रोग को नकसीर कहते हैं| नकसीर के रोग में अचानक पहले सिर में दर्द होता है और चक्कर आने लगते हैं,इसके बाद नाक से खून आने लगता है | यह रोग सर्दी की अपेक्षा गर्मी में अधिक होता है | नकसीर रोग ज़्यादा समय तक धूप में रहने से हो जाता है | कुछ लोग गर्म पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं जिसकी वजह से भी नाक से खून निकल सकता है | 
                                         नकसीर का उपचार विभिन्न औषधियों द्वारा किया जा सकता है -

१- तुलसी के पत्तों का रस ३-४ बूँद दिन में २-३ बार नाक में डालने से नकसीर में लाभ मिलता है | 

२- आधे कप अनार के रस में दो चम्मच मिश्री मिलाकर प्रतिदिन दोपहर के समय पीने से गर्मी के मौसम में नकसीर ठीक हो जाती है | | 

३- प्रतिदिन केले के साथ मीठा दूध पीने से नकसीर में लाभ होता है | यह प्रयोग लगातार दस दिन तक अवश्य करना चाहिए | 

४- बेल के पत्तों का रस पानी में मिलाकर पीने से नकसीर में लाभ मिलता है | 

५- लगभग १५-२० ग्राम गुलकंद को प्रतिदिन सुबह-शाम दूध के साथ खाने से नकसीर का पुराने से पुराना  रोग भी ठीक हो जाता है | 

६- अगर ज़्यादा तेज़ धूप में घूमने की वजह से नाक से खून बह रहा हो तो सिर पर लगातार ठंडा पानी डालने से नाक का खून बहना बंद हो जाता है | 

७- गर्मियों के मौसम में सेब के मुरब्बे में इलायची (कुटी हुई) डालकर खाने में नकसीर में बहुत लाभ होता है | 

सावधानियां - नकसीर रोग में रोगी को भोजन में गर्म तासीर वाले पदार्थ तथा मिर्च मसालों का सेवन नहीं करना चाहिए तथा रोगी को धूप में घूमने और आग के पास बैठने से भी बचना चाहिए |नकसीर (Epistaxis)-
नाक में से खून बहने के रोग को नकसीर कहते हैं| नकसीर के रोग में अचानक पहले सिर में दर्द होता है और चक्कर आने लगते हैं,इसके बाद नाक से खून आने लगता है | यह रोग सर्दी की अपेक्षा गर्मी में अधिक होता है | नकसीर रोग ज़्यादा समय तक धूप में रहने से हो जाता है | कुछ लोग गर्म पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं जिसकी वजह से भी नाक से खून निकल सकता है |
नकसीर का उपचार विभिन्न औषधियों द्वारा किया जा सकता है -

१- तुलसी के पत्तों का रस ३-४ बूँद दिन में २-३ बार नाक में डालने से नकसीर में लाभ मिलता है |

२- आधे कप अनार के रस में दो चम्मच मिश्री मिलाकर प्रतिदिन दोपहर के समय पीने से गर्मी के मौसम में नकसीर ठीक हो जाती है | |

३- प्रतिदिन केले के साथ मीठा दूध पीने से नकसीर में लाभ होता है | यह प्रयोग लगातार दस दिन तक अवश्य करना चाहिए |

४- बेल के पत्तों का रस पानी में मिलाकर पीने से नकसीर में लाभ मिलता है |

५- लगभग १५-२० ग्राम गुलकंद को प्रतिदिन सुबह-शाम दूध के साथ खाने से नकसीर का पुराने से पुराना रोग भी ठीक हो जाता है |

६- अगर ज़्यादा तेज़ धूप में घूमने की वजह से नाक से खून बह रहा हो तो सिर पर लगातार ठंडा पानी डालने से नाक का खून बहना बंद हो जाता है |

७- गर्मियों के मौसम में सेब के मुरब्बे में इलायची (कुटी हुई) डालकर खाने में नकसीर में बहुत लाभ होता है |

सावधानियां - नकसीर रोग में रोगी को भोजन में गर्म तासीर वाले पदार्थ तथा मिर्च मसालों का सेवन नहीं करना चाहिए तथा रोगी को धूप में घूमने और आग के पास बैठने से भी बचना चाहिए |


हींग (ASAFOETIDA )-

Photo: हींग (ASAFOETIDA )-
                                            हींग का उपयोग आमतौर पर दाल-सब्जी में छौंक लगाने के लिए किया  जाता है इसलिए इसे 'बघारनी 'के  नाम से भी  जाना जाता है । यह भारत के उत्तर पश्चिमी राज्यों से कश्मीर एवं पंजाब में पायी जाती है | हींग आहार में रूचि उत्पन्न करके अग्नि को प्रदीप्त करती है | 
                         हींग फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है | इसके पौधे के पत्तों और छाल में हलकी चोट देने से दूध निकलता है और वही दूध पेड़ पर सूख कर गोंद बनता है,उसे निकालकर सुखा लिया जाता है,जिसे बाद में हींग के नाम से जाना जाता है | 
                         हींग एक गुणकारी औषधि है | यह हलकी,गर्म और पाचक है | आईये जानते हैं हींग के औषधीय गुणों के विषय में -

१- हींग को पानी में पीसकर पेट पर (नाभी के आसपास) लेप करने से उलटी बंद हो जाती है और पेट दर्द में भी आराम मिलता है | 

२- हिंगाष्टक चूर्ण ६ ग्राम को पानी के साथ खाने से हर प्रकार की वायु की बीमारियां मिट जाती हैं | 

३- शुद्ध हींग को चम्मच भर पानी में गर्म करके रुई भिगोकर दर्द वाले दांत के नीचे रखें | ऐसा करने से दांत के दर्द में आराम मिलता है | 

४- कालीखांसी में  बच्चों के सीने पर हींग का लेप करने से लाभ मिलता है | 

५- यदि पेट में गैस बन रही हो तो हींग,काला नमक और भुनी हुई अजवायन को पीस कर चूर्ण  बना लें | इसे दिन में दो बार गुनगुने पानी से लें ,गैस में लाभ होगा | 

६- हींग को तिल के तेल में पकाकर उस तेल की बूँदें कान में डालने से तेज कान का दर्द दूर होता है | 

७- अचार की सुरक्षा के लिए बर्तन में पहले हींग का धुंआ दें | उसके बाद उसमे अचार भरें | इस प्रयोग से अचार  खराब नहीं होता है |
#watchAasthaChannel5amTo8amहींग (ASAFOETIDA )-
हींग का उपयोग आमतौर पर दाल-सब्जी में छौंक लगाने के लिए किया जाता है इसलिए इसे 'बघारनी 'के नाम से भी जाना जाता है । यह भारत के उत्तर पश्चिमी राज्यों से कश्मीर एवं पंजाब में पायी जाती है | हींग आहार में रूचि उत्पन्न करके अग्नि को प्रदीप्त करती है | 
हींग फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है | इसके पौधे के पत्तों और छाल में हलकी चोट देने से दूध निकलता है और वही दूध पेड़ पर सूख कर गोंद बनता है,उसे निकालकर सुखा लिया जाता है,जिसे बाद में हींग के नाम से जाना जाता है |
हींग एक गुणकारी औषधि है | यह हलकी,गर्म और पाचक है | आईये जानते हैं हींग के औषधीय गुणों के विषय में -

१- हींग को पानी में पीसकर पेट पर (नाभी के आसपास) लेप करने से उलटी बंद हो जाती है और पेट दर्द में भी आराम मिलता है |

२- हिंगाष्टक चूर्ण ६ ग्राम को पानी के साथ खाने से हर प्रकार की वायु की बीमारियां मिट जाती हैं |

३- शुद्ध हींग को चम्मच भर पानी में गर्म करके रुई भिगोकर दर्द वाले दांत के नीचे रखें | ऐसा करने से दांत के दर्द में आराम मिलता है |

४- कालीखांसी में बच्चों के सीने पर हींग का लेप करने से लाभ मिलता है |

५- यदि पेट में गैस बन रही हो तो हींग,काला नमक और भुनी हुई अजवायन को पीस कर चूर्ण बना लें | इसे दिन में दो बार गुनगुने पानी से लें ,गैस में लाभ होगा |

६- हींग को तिल के तेल में पकाकर उस तेल की बूँदें कान में डालने से तेज कान का दर्द दूर होता है |

७- अचार की सुरक्षा के लिए बर्तन में पहले हींग का धुंआ दें | उसके बाद उसमे अचार भरें | इस प्रयोग से अचार खराब नहीं होता है |

करौंदा-

Photo: करौंदा-
            करौंदे के विषय में हम सब जानते हैं | इसके कच्चे फल खट्टे होते हैं तथा पके हुए फल कुछ मीठे होते हैं | इसकी हमेशा हरी-भरी रहने वाली झाड़ी  होती है| इसके कंटक अत्यंत तीक्ष्ण तथा मजबूत होते हैं | आयुर्वेदीय संहिताओं में दो प्रकार के करौंदों का वर्णन प्राप्त होता है (१)करौंदा तथा (२)करौंदी | करौंदे के फल पकने के बाद काले पड़ जाते हैं इसलिए इनको कृष्णपाक फल कहते हैं | आइये जानते हैं करौंदे के कुछ औषधीय प्रयोगों के विषय में -

१- करौंदे के फल की चटनी बनाकर खाने से मसूड़ों के रोग मिटते हैं | 

२- पांच मिलीलीटर करौंदा पत्र स्वरस में शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी में लाभ होता है | 

३- करौंदे के पके हुए फलों को खाने से अरुचि तथा पित्त विकारों में लाभ होता है | 

४- जलोदर के रोगी को करौंदे के पत्तों का स्वरस पहले दिन ५  मिली,दुसरे दिन १० मिली,इस तरह प्रतिदिन ५-५ मिली बढ़ाते हुए ५० मिली तक सेवन कराएं तथा पुनः घटाते हुए ५ मिली तक प्रयोग करें| इस प्रकार नित्य प्रातःकाल पिलाने से जलोदर में लाभ होता है | 

५- पांच ग्राम करौंदे के पत्तों को पीसकर दही के साथ मिलाकर खिलाने से मिर्गी में लाभ होता है |    

६- करौंदे के बीजों को पीसकर पैरों पर लगाने से बिवाई (पैरों का फटना ) में लाभ होता है |#watchAasthaChannel5amTo8amकरौंदा-
करौंदे के विषय में हम सब जानते हैं | इसके कच्चे फल खट्टे होते हैं तथा पके हुए फल कुछ मीठे होते हैं | इसकी हमेशा हरी-भरी रहने वाली झाड़ी होती है| इसके कंटक अत्यंत तीक्ष्ण तथा मजबूत होते हैं | आयुर्वेदीय संहिताओं में दो प्रकार के करौंदों का वर्णन प्राप्त होता है (१)करौंदा तथा (२)करौंदी | करौंदे के फल पकने के बाद काले पड़ जाते हैं इसलिए इनको कृष्णपाक फल कहते हैं | आइये जानते हैं करौंदे के कुछ औषधीय प्रयोगों के विषय में -

१- करौंदे के फल की चटनी बनाकर खाने से मसूड़ों के रोग मिटते हैं |

२- पांच मिलीलीटर करौंदा पत्र स्वरस में शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी में लाभ होता है |

३- करौंदे के पके हुए फलों को खाने से अरुचि तथा पित्त विकारों में लाभ होता है |

४- जलोदर के रोगी को करौंदे के पत्तों का स्वरस पहले दिन ५ मिली,दुसरे दिन १० मिली,इस तरह प्रतिदिन ५-५ मिली बढ़ाते हुए ५० मिली तक सेवन कराएं तथा पुनः घटाते हुए ५ मिली तक प्रयोग करें| इस प्रकार नित्य प्रातःकाल पिलाने से जलोदर में लाभ होता है |

५- पांच ग्राम करौंदे के पत्तों को पीसकर दही के साथ मिलाकर खिलाने से मिर्गी में लाभ होता है |

६- करौंदे के बीजों को पीसकर पैरों पर लगाने से बिवाई (पैरों का फटना ) में लाभ होता है 

तोरई -

Photo: तोरई -
            तोरई से हम सब अच्छी तरह से परिचित हैं| यह एक प्रकार की सब्जी है और इसकी खेती भारत में सभी स्थानों पर की जाती है | इसकी प्रकृति ठंडी व तर होती है | ग्रीष्म और वर्षा ऋतू में तोरई की सब्जी का प्रयोग में अधिक किया जाता है | 
                         विभिन्न रोगों का तोरई से उपचार -

 १- तोरई के टुकड़ों को छाया में सुखाकर कूट लें | इसके बाद इन टुकड़ों को नारियल के तेल में चार दिन तक डालकर रखें | फिर इसे उबालें और छानकर बोतल में भर लें | इस तेल से सिर की मालिश करने से बाल काले हो जाते हैं | 

२- तोरई के पत्तों को पीस लें | यह लेप कुष्ठ पर लगाने से लाभ मिलता है | 

३- तोरई की सब्जी के सेवन से कब्ज दूर होती है और बवासीर में आराम मिलता है | 

४- तोरई पेशाब की जलन और पेशाब की बिमारी दूर करने में लाभकारी है | 

५- तोरई की जड़ को ठन्डे पानी में घिसकर फोड़े की गाँठ पर लगाने से जल्दी ही गाँठ ख़त्म होने लगती है | 

६- तोरई के सेवन से घुटनों के दर्द में आराम मिलता है |तोरई -
तोरई से हम सब अच्छी तरह से परिचित हैं| यह एक प्रकार की सब्जी है और इसकी खेती भारत में सभी स्थानों पर की जाती है | इसकी प्रकृति ठंडी व तर होती है | ग्रीष्म और वर्षा ऋतू में तोरई की सब्जी का प्रयोग में अधिक किया जाता है | 
विभिन्न रोगों का तोरई से उपचार -

१- तोरई के टुकड़ों को छाया में सुखाकर कूट लें | इसके बाद इन टुकड़ों को नारियल के तेल में चार दिन तक डालकर रखें | फिर इसे उबालें और छानकर बोतल में भर लें | इस तेल से सिर की मालिश करने से बाल काले हो जाते हैं |

२- तोरई के पत्तों को पीस लें | यह लेप कुष्ठ पर लगाने से लाभ मिलता है |

३- तोरई की सब्जी के सेवन से कब्ज दूर होती है और बवासीर में आराम मिलता है |

४- तोरई पेशाब की जलन और पेशाब की बिमारी दूर करने में लाभकारी है |

५- तोरई की जड़ को ठन्डे पानी में घिसकर फोड़े की गाँठ पर लगाने से जल्दी ही गाँठ ख़त्म होने लगती है |

६- तोरई के सेवन से घुटनों के दर्द में आराम मिलता है |

मुलेठी (यष्टीमधु )

Photo: मुलेठी (यष्टीमधु ) -
      मुलेठी से हम सब परिचित हैं | भारतवर्ष में इसका उत्पादन कम ही होता है | यह अधिकांश रूप से विदेशों से आयातित की जाती है| मुलेठी की जड़ एवं सत सर्वत्र बाज़ारों में पंसारियों के यहाँ मिलता है | चरकसंहिता में रसायनार्थ यष्टीमधु का प्रयोग विशेष रूप से वर्णित है | सुश्रुत संहिता में यष्टिमधु फल का प्रयोग विरेचनार्थ मिलता है | मुलेठी रेशेदार,गंधयुक्त तथा बहुत ही उपयोगी होती है | यह ही एक ऐसी वस्तु है जिसका सेवन किसी भी मौसम में किया जा सकता है | मुलेठी वातपित्तशामक है | यह खाने में ठंडी होती है | इसमें ५० प्रतिशत पानी होता है | इसका मुख्य घटक ग्लीसराइज़ीन है जिसके कारण ये खाने में मीठा होता है | इसके अतिरिक्त इसमें घावों को भरने वाले विभिन्न घटक भी मौजूद हैं | मुलेठी खांसी,जुकाम,उल्टी व पित्त को बंद करती है | यह पेट की जलन व दर्द,पेप्टिक अलसर तथा इससे होने वाली खून की उल्टी में भी बहुत उपयोगी है | 
                           आज हम आपको मुलेठी के कुछ औषधीय गुणों से अवगत कराएंगे -

१- मुलेठी चूर्ण और आंवला चूर्ण २-२ ग्राम की मात्रा में मिला लें | इस चूर्ण को दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह- शाम चाटने से खांसी में बहुत लाभ होता है |

२- मुलेठी-१० ग्राम 
     काली मिर्च -१० ग्राम 
     लौंग    -०५ ग्राम 
      हरड़   -०५ ग्राम
     मिश्री - २० ग्राम 
     ऊपर दी गयी सारी सामग्री को मिलाकर पीस लें | इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह शहद के साथ चाटने से पुरानी खांसी और जुकाम,गले की खराबी,सिर दर्द आदि रोग दूर हो जाते हैं | 

३- एक चम्मच मुलेठी का चूर्ण एक कप दूध के साथ लेने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है | 

४- मुलेठी को मुहं में रखकर चूंसने से मुहँ के छाले मिटते हैं तथा स्वर भंग (गला बैठना) में लाभ होता है | 

५- एक चम्मच मुलेठी चूर्ण में शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से पेट और आँतों की ऐंठन व दर्द का शमन होता है | 

६- फोड़ों पर मुलेठी का लेप लगाने से वो जल्दी पक कर फूट जाते हैं |मुलेठी (यष्टीमधु ) -
मुलेठी से हम सब परिचित हैं | भारतवर्ष में इसका उत्पादन कम ही होता है | यह अधिकांश रूप से विदेशों से आयातित की जाती है| मुलेठी की जड़ एवं सत सर्वत्र बाज़ारों में पंसारियों के यहाँ मिलता है | चरकसंहिता में रसायनार्थ यष्टीमधु का प्रयोग विशेष रूप से वर्णित है | सुश्रुत संहिता में यष्टिमधु फल का प्रयोग विरेचनार्थ मिलता है | मुलेठी रेशेदार,गंधयुक्त तथा बहुत ही उपयोगी होती है | यह ही एक ऐसी वस्तु है जिसका सेवन किसी भी मौसम में किया जा सकता है | मुलेठी वातपित्तशामक है | यह खाने में ठंडी होती है | इसमें ५० प्रतिशत पानी होता है | इसका मुख्य घटक ग्लीसराइज़ीन है जिसके कारण ये खाने में मीठा होता है | इसके अतिरिक्त इसमें घावों को भरने वाले विभिन्न घटक भी मौजूद हैं | मुलेठी खांसी,जुकाम,उल्टी व पित्त को बंद करती है | यह पेट की जलन व दर्द,पेप्टिक अलसर तथा इससे होने वाली खून की उल्टी में भी बहुत उपयोगी है |
आज हम आपको मुलेठी के कुछ औषधीय गुणों से अवगत कराएंगे -

१- मुलेठी चूर्ण और आंवला चूर्ण २-२ ग्राम की मात्रा में मिला लें | इस चूर्ण को दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह- शाम चाटने से खांसी में बहुत लाभ होता है |

२- मुलेठी-१० ग्राम
काली मिर्च -१० ग्राम
लौंग -०५ ग्राम
हरड़ -०५ ग्राम
मिश्री - २० ग्राम
ऊपर दी गयी सारी सामग्री को मिलाकर पीस लें | इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह शहद के साथ चाटने से पुरानी खांसी और जुकाम,गले की खराबी,सिर दर्द आदि रोग दूर हो जाते हैं |

३- एक चम्मच मुलेठी का चूर्ण एक कप दूध के साथ लेने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है |

४- मुलेठी को मुहं में रखकर चूंसने से मुहँ के छाले मिटते हैं तथा स्वर भंग (गला बैठना) में लाभ होता है |

५- एक चम्मच मुलेठी चूर्ण में शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से पेट और आँतों की ऐंठन व दर्द का शमन होता है |

६- फोड़ों पर मुलेठी का लेप लगाने से वो जल्दी पक कर फूट जाते हैं |

चिरौंजी [Calumpang -nut

Photo: चिरौंजी  [Calumpang -nut -Tree ]
    
              चिरौंजी के पेड़  भारत के पश्चिम प्रायद्वीप  एवं उत्तराखण्ड  में 450 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है , महाराष्ट्र , नागपुर और मालाबार में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं | इसके वृक्ष छाल अत्यन्त खुरदुरी होती है इसलिए संस्कृत में खरस्कन्द तथा इसकी छाल अधिक मोटी होती है ,इसलिए इसे  बहुलवल्कल कहते हैं | इसके फल ८-१२ मिलीमीटर के गोलाकार कृष्ण वर्ण के ,मांसल , काले बीजयुक्त होते हैं | फलों को फोड़ कर जो गुठली निकाली जाती है  उसे चिरौंजी कहते हैं | यह  अत्यंत पौष्टिक तथा बलवर्धक होती है | चिरौंजी एक मेवा होती है और इसे विभिन्न प्रकार के पकवानों और मिठाईयों में डाला  है | इसका पुष्पकाल एवं  फलकाल जनवरी-मार्च तथा मार्च-मई तक होता है | इसके बीज एवं तेल में एमिनो अम्ल , लीनोलीक ,मिरिस्टीक , ओलिक , पॉमिटिक , स्टीएरिक अम्ल एवं विटामिन पाया जाता है | 
   विभिन्न रोगों  चिरौंजी से उपचार --------
१- पांच-दस  ग्राम चिरौंजी पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर दूध के साथ खाने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है | 
२-चिरौंजी को गुलाब जल में पीसकर चेहरे पर लगाने से मुंहांसे ठीक होते हैं | 
३-दूध में चिरौंजी  की खीर बनाकर खाने से शरीर का पोषण होता है | 
४-पांच -दस ग्राम चिरौंजी की गिरी को खाने से तथा चिरौंजी को दूध में पीसकर मालिश करने से शीतपित्त में लाभ होता है | 
५-चिरौंजी की ५-१० ग्राम गिरी को  भूनकर ,पीसकर २०० मिलीलीटर  दूध मिलाकर उबाल लें | उबालने के बाद ५०० मिलीग्राम इलायची चूर्ण व थोड़ी सी चीनी मिलाकर पिलाने से खांसी तथा जुकाम में लाभ होता है ।चिरौंजी [Calumpang -nut -Tree ]

चिरौंजी के पेड़ भारत के पश्चिम प्रायद्वीप एवं उत्तराखण्ड में 450 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है , महाराष्ट्र , नागपुर और मालाबार में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं | इसके वृक्ष छाल अत्यन्त खुरदुरी होती है इसलिए संस्कृत में खरस्कन्द तथा इसकी छाल अधिक मोटी होती है ,इसलिए इसे बहुलवल्कल कहते हैं | इसके फल ८-१२ मिलीमीटर के गोलाकार कृष्ण वर्ण के ,मांसल , काले बीजयुक्त होते हैं | फलों को फोड़ कर जो गुठली निकाली जाती है उसे चिरौंजीकहते हैं | यह अत्यंत पौष्टिक तथा बलवर्धक होती है | चिरौंजी एक मेवा होती है और इसे विभिन्न प्रकार के पकवानों और मिठाईयों में डाला है | इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जनवरी-मार्च तथा मार्च-मई तक होता है | इसके बीज एवं तेल में एमिनो अम्ल , लीनोलीक ,मिरिस्टीक , ओलिक , पॉमिटिक , स्टीएरिक अम्ल एवं विटामिन पाया जाता है |
विभिन्न रोगों चिरौंजी से उपचार --------
१- पांच-दस ग्राम चिरौंजी पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर दूध के साथ खाने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है |
२-चिरौंजी को गुलाब जल में पीसकर चेहरे पर लगाने से मुंहांसे ठीक होते हैं |
३-दूध में चिरौंजी की खीर बनाकर खाने से शरीर का पोषण होता है |
४-पांच -दस ग्राम चिरौंजी की गिरी को खाने से तथा चिरौंजी को दूध में पीसकर मालिश करने से शीतपित्त में लाभ होता है |
५-चिरौंजी की ५-१० ग्राम गिरी को भूनकर ,पीसकर २०० मिलीलीटर दूध मिलाकर उबाल लें | उबालने के बाद ५०० मिलीग्राम इलायची चूर्ण व थोड़ी सी चीनी मिलाकर पिलाने से खांसी तथा जुकाम में लाभ होता है ।

बेल

Photo: बेल -
बेल का वृक्ष बहुत प्राचीन है |यह लगभग २०-३० फुट ऊंचा होता है | इसके पत्ते जुड़े हुए त्रिफाक और गंधयुक्त होते हैं | इसका फल ३-४ इंच व्यास का गोलाकार और पीले रंग का होता है | बीज कड़े और छोटे होते हैं | बेल के फल का गूदा और बीज एक उत्तम विरेचक (पेट साफ़ करने वाले ) माने जाते हैं | बेल शर्करा को कम करने वाला,कफ व वात को शांत करने वाला,अतिसार, मधुमेह,रक्तार्श,श्वेत प्रदर व अति रज : स्राव को नष्ट करने वाला होता है | आइए जानते हैं बेल के औषधीय गुण -

१- पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है | इसके सेवन से संग्रहणी रोग बहुत जल्दी ही दूर हो जाता है | 

२- बेल का मुरब्बा खाने से पित्त व अतिसार में लाभ होता है | पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है | 

३- दस ग्राम बेल के पत्तों को ४-५ कालीमिर्च के साथ पीसकर उसमे १० ग्राम मिश्री मिलकर शरबत बना लें | इसका दिन में तीन बार सेवन करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है | 

४- बेल के गूदे को गुड़ मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी दस्त ) के रोगी का रोग दूर हो जाता है | 

५- मिश्री मिले हुए दूध के साथ बेल की गिरी के चूर्ण का सेवन करने से, खून की कमी व शारीरिक दुर्बलता दूर होती है | 

६- बेल के पत्तों को पीसकर छान लें, इस १० मिलीलीटर रस के प्रतिदिन सेवन से मधुमेह में शर्करा आना कम हो जाती हैं |बेल -
बेल का वृक्ष बहुत प्राचीन है |यह लगभग २०-३० फुट ऊंचा होता है | इसके पत्ते जुड़े हुए त्रिफाक और गंधयुक्त होते हैं | इसका फल ३-४ इंच व्यास का गोलाकार और पीले रंग का होता है | बीज कड़े और छोटे होते हैं | बेल के फल का गूदा और बीज एक उत्तम विरेचक (पेट साफ़ करने वाले ) माने जाते हैं | बेल शर्करा को कम करने वाला,कफ व वात को शांत करने वाला,अतिसार, मधुमेह,रक्तार्श,श्वेत प्रदर व अति रज : स्राव को नष्ट करने वाला होता है | आइए जानते हैं बेल के औषधीय गुण -

१- पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है | इसके सेवन से संग्रहणी रोग बहुत जल्दी ही दूर हो जाता है |

२- बेल का मुरब्बा खाने से पित्त व अतिसार में लाभ होता है | पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है |

३- दस ग्राम बेल के पत्तों को ४-५ कालीमिर्च के साथ पीसकर उसमे १० ग्राम मिश्री मिलकर शरबत बना लें | इसका दिन में तीन बार सेवन करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है |

४- बेल के गूदे को गुड़ मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी दस्त ) के रोगी का रोग दूर हो जाता है |

५- मिश्री मिले हुए दूध के साथ बेल की गिरी के चूर्ण का सेवन करने से, खून की कमी व शारीरिक दुर्बलता दूर होती है |

६- बेल के पत्तों को पीसकर छान लें, इस १० मिलीलीटर रस के प्रतिदिन सेवन से मधुमेह में शर्करा आना कम हो जाती हैं |

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 1-Corn- corn from China. Some producers add sodium cyclamate to their corn. The purpose of this additive is to preserve the yellow color of...